
अल्मोड़ा। कुमाऊंनी बोली-भाषा और पारंपरिक लोकधुनों को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने वाले साहित्यकार और रंगकर्मी जुगल किशोर पेटशाली का 79 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने बृहस्पतिवार की रात अल्मोड़ा के दलबैंड स्थित पैतृक आवास पर अंतिम सांस ली।
पेटशाली लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे। शुक्रवार को लखुड़ियार घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया गया। वे पत्नी, छह बेटों और नाती-पोतों से भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं।
7 सितंबर 1946 को अल्मोड़ा जिले के पेटशाल गांव में जन्मे पेटशाली ने अपने साहित्यिक सफर की शुरुआत 1990 में प्रकाशित कृति राजुला-मालूशाही से की, जो बाद में संगीत नाटिका के रूप में भी मंचित हुई। उनकी चर्चित कृतियों में अजुवा-बफौल, जय बाला गोरिया, नौ-लखा दीवान, कुमाऊंनी लोकगीत, उत्तरांचल के लोक वाद्य, पिंगला भृतहरि और गंगनाथ-गीतावली प्रमुख हैं।
उन्होंने लोकधुनों पर गहन शोध कर छपेली, चांचरी, झोड़ा, न्योली, भगनौल, बैर और जागर जैसी 34 पारंपरिक धुनों को अपनी रचनाओं में सहेजा। अब तक उनकी 18 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।
पेटशाली को जयशंकर प्रसाद पुरस्कार, सुमित्रानंदन पंत पुरस्कार, उत्तराखंड संस्कृतिकर्मी पुरस्कार और कुमाऊं गौरव सम्मान से सम्मानित किया गया था।