नई दिल्ली : राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की हालिया पनडुब्बी यात्रा ने भारतीय नौसेना के मनोबल को नई ऊंचाई दी है। देश की सर्वोच्च सैन्य कमांडर के रूप में राष्ट्रपति का सीधे अग्रिम पंक्ति की पनडुब्बी से जुड़ना न केवल ऐतिहासिक है, बल्कि यह समुद्री सुरक्षा को लेकर भारत की गंभीरता और आत्मनिर्भर रक्षा नीति को भी रेखांकित करता है।
नौसेना अधिकारियों के अनुसार, राष्ट्रपति की यह यात्रा केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं थी, बल्कि पनडुब्बी बेड़े की परिचालन क्षमता और रणनीतिक महत्व को समझने का प्रत्यक्ष अनुभव भी रही। सीमित जगह, पूर्ण गोपनीयता और उच्च जोखिम वाले वातावरण में कार्यरत पनडुब्बी कर्मियों के साथ राष्ट्रपति का संवाद जवानों के लिए विशेष प्रेरणा का स्रोत बना।
राष्ट्रपति ने पनडुब्बी के भीतर मौजूद प्रणालियों, आपातकालीन प्रक्रियाओं और तकनीकी नियंत्रणों का निरीक्षण किया। उन्होंने इस दौरान कहा कि पनडुब्बी बल भारत की समुद्री शक्ति की वह अदृश्य ढाल है, जो संकट के समय सबसे पहले और सबसे गहराई में सक्रिय रहती है।
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह यात्रा ऐसे समय में हुई है, जब हिंद महासागर क्षेत्र में सामरिक प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। ऐसे में शीर्ष नेतृत्व का सीधे समुद्री प्लेटफॉर्म से जुड़ना यह संकेत देता है कि भारत अपनी नौसैनिक तैयारियों को केवल कागजों तक सीमित नहीं रख रहा, बल्कि वास्तविक स्तर पर मजबूती दे रहा है।
आईएनएस वाघशीर जैसी स्वदेशी पनडुब्बियां भारत की उस सोच को दर्शाती हैं, जिसमें तकनीकी आत्मनिर्भरता, गोपनीय युद्ध क्षमता और दीर्घकालिक सुरक्षा रणनीति को एक साथ साधा जा रहा है। राष्ट्रपति की यह यात्रा इसी दिशा में एक प्रेरक और संदेशात्मक कदम मानी जा रही है।
