पद्मश्री से सम्मानित ह्यूग गैंट्ज़र का निधन भारतीय यात्रा लेखन, वृत्तचित्र निर्माण और सांस्कृतिक दस्तावेज़ीकरण के एक स्वर्णिम अध्याय का अंत है। भारतीय नौसेना के अनुशासन से लेकर भारत की आत्मा को शब्दों और दृश्यों में पिरोने तक, उनका जीवन प्रेरणास्रोत रहा। उनके पुत्र पीटर गैंट्ज़र के मसूरी पहुंचने के बाद उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। ह्यूग गैंट्ज़र की विरासत आने वाली पीढ़ियों को भारत को समझने और महसूस करने की प्रेरणा देती रहेगी।
मसूरी : पद्मश्री से सम्मानित और प्रसिद्ध यात्रा वृतांत लेखक ह्यूग गैंट्ज़र का 95 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनके निधन से साहित्य, यात्रा लेखन और सांस्कृतिक पत्रकारिता के क्षेत्र में अपूरणीय क्षति हुई है। वह भारतीय नौसेना के पूर्व अधिकारी थे और कमांडर पद से सेवानिवृत्त हुए थे।
नौसेना से साहित्य तक का असाधारण सफ़र
9 जनवरी 1931 को पटना में जन्मे ह्यूग गैंट्ज़र ने हैम्पटन कोर्ट स्कूल, सेंट जॉर्ज कॉलेज मसूरी, सेंट जोसेफ स्कूल नैनीताल, सेंट जेवियर्स कॉलेज कोलकाता तथा बॉम्बे के के.सी. लॉ कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की। भारतीय नौसेना से सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने अपनी पत्नी कोलीन गैंट्ज़र के साथ भारत की सांस्कृतिक विविधता और ‘इंडियन मोज़ेक’ को शब्दों और दृश्यों में संजोने का निर्णय लिया।
लेखन, किताबें और दूरदर्शन की ऐतिहासिक यात्रा
ह्यूग और कोलीन गैंट्ज़र ने मिलकर 3,000 से अधिक लेख, कॉलम और पत्रिका फीचर्स लिखे तथा 30 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित कीं।इसके साथ ही उन्होंने दूरदर्शन पर पूरे भारत में प्रसारित होने वाले पहले यात्रा वृत्तचित्र—“लुकिंग बियोंड विद ह्यूग एंड कोलीन गैंट्ज़र” और“टेक अ ब्रेक विद ह्यूग एंड कोलीन गैंट्ज़र”का निर्माण कर भारतीय टेलीविज़न इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा।
पत्नी की प्रेरणा और सार्वजनिक जीवन में योगदान
ह्यूग गैंट्ज़र ने स्वयं स्वीकार किया था कि वे अपनी दिवंगत पत्नी कोलीन की प्रेरणा से ही यात्रा वृतांत लेखक बने। कोलीन अत्यंत जिज्ञासु, साहसी और संवेदनशील थीं—ऐसी कि अनजान लोग भी उनसे अपने दिल की बातें साझा कर लेते थे।ह्यूग गैंट्ज़र वर्ष 1988 से सुप्रीम कोर्ट मॉनिटरिंग कमेटी के सदस्य भी रहे। उनके पिता जे.एफ. गैंट्ज़र ब्रिटिश काल में 1941–43 के दौरान मसूरी नगर पालिका के प्रशासक एवं चेयरमैन रहे थे।
