(सलीम रज़ा, पत्रकार)
भारत में एक अजीब सा लोकतांत्रिक फैशन चल रहा है। यहाँ खादी और खाकी दोनों जनता के सेवक कहलाते हैं, लेकिन असलियत में कहानी कुछ और ही है। कागज पर खाकी कानून की रखवाली करती है और खादी जनता की सेवा करती है, मगर जमीन पर अक्सर खादी, खाकी की “मालिक” बन जाती है। और जब मालिक ही नियमों को अपनी सुविधा के हिसाब से मोड़ने लगे, तो न्याय बेचारा कोने में खड़ा होकर अपनी बारी का इंतजार करता रह जाता है।
खाकी पहनने वाला हर व्यक्ति एक सपना लेकर नौकरी में आता है। वह सोचता है कि वह अपराधियों से लड़ेगा, कमजोरों की मदद करेगा और समाज को सुरक्षित बनाएगा। ट्रेनिंग के दौरान उसे सिखाया जाता है कि कानून सबसे ऊपर है, कोई भी व्यक्ति कानून से बड़ा नहीं है। लेकिन जैसे ही वह असली दुनिया में कदम रखता है, उसे एक नया पाठ पढ़ाया जाता है—कानून अपनी जगह है, लेकिन फोन कॉल उससे भी ऊपर है। और यह फोन कॉल किसी आम आदमी का नहीं होता, बल्कि खादी पहनने वाले उस व्यक्ति का होता है, जो खुद को जनता का प्रतिनिधि कहता है।
थाने का दृश्य बड़ा दिलचस्प होता है। जब कोई आम आदमी शिकायत लेकर आता है, तो उससे सवाल पर सवाल पूछे जाते हैं—कहाँ हुआ, कैसे हुआ, क्यों हुआ, गवाह कौन है, सबूत क्या है। लेकिन जब खादी का फोन आता है, तो कोई सवाल नहीं पूछा जाता। आदेश सीधे दिल और दिमाग तक पहुँचता है—“इस मामले को अभी रोक दो”, “उसे छोड़ दो”, “इस पर कार्रवाई मत करो।” कानून की किताब टेबल पर खुली रहती है, लेकिन पुलिस अधिकारी की नजर फोन पर होती है।
यहाँ सबसे बड़ा मजाक यह है कि पुलिस को कानून लागू करने की जिम्मेदारी दी गई है, लेकिन कई बार उसे कानून से ज्यादा आदेश लागू करने पड़ते हैं। अगर पुलिस अधिकारी आदेश नहीं मानता, तो उसे एक ऐसा तोहफा मिलता है, जिसे सरकारी भाषा में ट्रांसफर कहा जाता है। यह ट्रांसफर किसी नई जगह पर काम करने का अवसर नहीं, बल्कि एक सजा होती है। अचानक उसे ऐसी जगह भेज दिया जाता है, जहाँ न सुविधा होती है, न संसाधन, और न ही कोई पहचान। यह एक संदेश होता है—ईमानदारी अच्छी चीज है, लेकिन सिस्टम के खिलाफ नहीं।
धीरे-धीरे खाकी भी सिस्टम को समझ जाती है। वह जान जाती है कि ज्यादा ईमानदारी करियर के लिए खतरनाक हो सकती है। इसलिए वह संतुलन बनाना सीख जाती है—कानून भी निभाना है और आदेश भी मानना है। यह संतुलन ही वह जगह है, जहाँ न्याय अक्सर गिर जाता है।
आम आदमी की हालत सबसे ज्यादा दुखद होती है। वह थाने में जाता है, उम्मीद लेकर कि उसकी समस्या सुनी जाएगी। लेकिन कई बार उसे सलाह मिलती है—“भाई, समझौता कर लो, यही बेहतर है।” यह सलाह कानून की किताब में नहीं लिखी होती, लेकिन सिस्टम की मजबूरी में लिखी होती है। आम आदमी धीरे-धीरे समझ जाता है कि न्याय पाने के लिए सिर्फ सच होना काफी नहीं है, ताकत भी होनी चाहिए, पहचान भी होनी चाहिए।
सबसे बड़ा नुकसान जनता के विश्वास का होता है। जब जनता को लगता है कि कानून सबके लिए बराबर नहीं है, तो उसका विश्वास सिस्टम से उठने लगता है। और जब विश्वास खत्म हो जाता है, तो कानून की ताकत भी कमजोर हो जाती है। क्योंकि कानून की असली ताकत उसकी धाराओं में नहीं, बल्कि जनता के भरोसे में होती है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि खादी और खाकी दोनों खुद को जनता का सेवक कहते हैं। लेकिन जब सेवक ही सेवक पर हावी हो जाए, तो असली मालिक यानी जनता खुद को असहाय महसूस करने लगती है। जनता वोट देकर खादी को ताकत देती है और टैक्स देकर खाकी को वेतन देती है, लेकिन जब उसे जरूरत होती है, तो वही जनता दर-दर भटकती है।
यह पूरा सिस्टम एक ऐसे नाटक की तरह लगता है, जिसमें हर किरदार अपनी भूमिका निभा रहा है, लेकिन कहानी का अंत हमेशा अधूरा रह जाता है। खाकी चाहकर भी पूरी तरह स्वतंत्र नहीं है, और खादी चाहकर भी पूरी तरह निष्पक्ष नहीं रह पाती। और इस बीच न्याय एक ऐसा पात्र बन जाता है, जिसकी चर्चा तो हर कोई करता है, लेकिन जिसकी मदद करने के लिए कोई आगे नहीं आता।
व्यंग्य की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि वह हँसाते-हँसाते सच दिखा देता है। सच यह है कि जब तक खाकी को बिना डर के कानून लागू करने की आजादी नहीं मिलेगी, तब तक न्याय सिर्फ एक आदर्श बना रहेगा, हकीकत नहीं। जब तक आदेश कानून से ऊपर रहेगा, तब तक कानून की किताब सिर्फ एक औपचारिकता बनकर रह जाएगी।
एक दिन शायद ऐसा समय आए, जब खाकी सिर्फ कानून की सुने और खादी सिर्फ जनता की। उस दिन न्याय को किसी सिफारिश की जरूरत नहीं होगी। उस दिन थाने का दरवाजा आम आदमी के लिए भी उतना ही खुला होगा, जितना किसी प्रभावशाली व्यक्ति के लिए। लेकिन तब तक यह व्यंग्य सच की तरह जिंदा रहेगा और सच व्यंग्य की तरह कड़वा लगता रहेगा।

