(सलीम रज़ा, पत्रकार)
अच्छी पेरेंटिंग किसी भी बच्चे के जीवन की सबसे मजबूत नींव होती है। जिस तरह किसी घर की मजबूती उसकी बुनियाद पर निर्भर करती है, उसी तरह बच्चे का भविष्य उसके माता-पिता के व्यवहार, प्यार, अनुशासन और मार्गदर्शन पर टिका होता है। जब बच्चे को सही दिशा, समझ और भावनात्मक सहारा नहीं मिलता, तो उसका असर उसके व्यक्तित्व, सोच, व्यवहार और पूरे जीवन पर दिखाई देने लगता है। अच्छी पेरेंटिंग का अभाव केवल बचपन तक सीमित समस्या नहीं है, बल्कि यह बड़े होने तक उसके साथ चलता है।
सबसे पहला दुष्प्रभाव बच्चे के आत्मविश्वास पर पड़ता है। जब माता-पिता बच्चे की बात नहीं सुनते, उसे बार-बार डांटते या अपमानित करते हैं, या उसकी छोटी-छोटी उपलब्धियों की सराहना नहीं करते, तो बच्चे के मन में यह भावना बैठ जाती है कि वह पर्याप्त अच्छा नहीं है। वह खुद पर भरोसा करना छोड़ देता है। ऐसे बच्चे अक्सर किसी भी काम को शुरू करने से पहले ही डर जाते हैं कि वे असफल हो जाएंगे। धीरे-धीरे उनमें हीन भावना विकसित हो जाती है।
अच्छी पेरेंटिंग की कमी का असर बच्चे की भावनात्मक सेहत पर भी पड़ता है। यदि घर का माहौल तनावपूर्ण हो, माता-पिता के बीच झगड़े होते रहें, या बच्चे को प्यार और सुरक्षा का एहसास न मिले, तो वह अंदर ही अंदर असुरक्षित महसूस करने लगता है। वह या तो बहुत चुप और डरपोक हो जाता है या फिर गुस्सैल और जिद्दी। कई बार बच्चे अपनी भावनाओं को सही तरीके से व्यक्त नहीं कर पाते और उनके अंदर चिंता, अवसाद या अकेलेपन की भावना पनपने लगती है।
ऐसे बच्चों में व्यवहार संबंधी समस्याएं भी देखने को मिलती हैं। यदि माता-पिता सही-गलत का फर्क समझाने के बजाय या तो बहुत ज्यादा सख्ती करते हैं या बिल्कुल ध्यान नहीं देते, तो बच्चा अनुशासन नहीं सीख पाता। वह स्कूल में झगड़ा कर सकता है, झूठ बोल सकता है या नियमों को तोड़ सकता है। कभी-कभी वह गलत संगति में भी पड़ सकता है क्योंकि उसे घर से वह मार्गदर्शन नहीं मिला जिसकी उसे जरूरत थी।
पढ़ाई पर भी इसका सीधा असर पड़ता है। जिन बच्चों को घर में प्रोत्साहन नहीं मिलता, वे पढ़ाई को महत्व नहीं देते। यदि माता-पिता बच्चे की शिक्षा में रुचि नहीं लेते, होमवर्क में मदद नहीं करते या उसकी कठिनाइयों को समझने की कोशिश नहीं करते, तो बच्चा पढ़ाई से दूर होने लगता है। उसे लग सकता है कि उसकी मेहनत की कोई कीमत नहीं है। इससे उसका शैक्षणिक प्रदर्शन कमजोर हो सकता है और आगे चलकर उसके करियर पर भी असर पड़ सकता है।
अच्छी पेरेंटिंग का मतलब केवल प्यार देना ही नहीं, बल्कि सीमाएं तय करना और जिम्मेदारी सिखाना भी है। जब बच्चे को हर चीज उसकी मांग पर मिल जाती है और उसे किसी भी गलती के लिए रोका-टोका नहीं जाता, तो वह जिम्मेदार बनना नहीं सीखता। बड़े होकर ऐसे बच्चों को जीवन की चुनौतियों का सामना करने में कठिनाई होती है। वे छोटी-छोटी समस्याओं में भी टूट जाते हैं क्योंकि उन्हें संघर्ष करना नहीं सिखाया गया।
सामाजिक जीवन पर भी इसका प्रभाव पड़ता है। जो बच्चे घर में सम्मान, संवाद और समझ नहीं देखते, वे दूसरों के साथ भी वैसा ही व्यवहार करने लगते हैं। उन्हें रिश्ते निभाना मुश्किल लगता है। वे या तो लोगों पर जल्दी भरोसा नहीं करते या फिर जरूरत से ज्यादा निर्भर हो जाते हैं। स्वस्थ संबंध बनाने और बनाए रखने की कला वे नहीं सीख पाते।
कई बार खराब पेरेंटिंग का असर इतना गहरा होता है कि बच्चा बड़े होकर भी अपने बचपन के घाव ढोता रहता है। वह अपने माता-पिता से मिली नकारात्मक बातों को सच मान लेता है और अपने बारे में वही सोच विकसित कर लेता है। यदि समय रहते उसे सही मार्गदर्शन या भावनात्मक सहारा न मिले, तो यह उसकी मानसिक सेहत को लंबे समय तक प्रभावित कर सकता है।
हालांकि यह भी सच है कि हर माता-पिता जानबूझकर गलत पेरेंटिंग नहीं करते। कई बार जानकारी की कमी, आर्थिक दबाव, काम का तनाव या अपने ही बचपन के अनुभव उनकी परवरिश के तरीके को प्रभावित करते हैं। लेकिन यह समझना जरूरी है कि बच्चे को सबसे ज्यादा जरूरत प्यार, सुरक्षा, संवाद और संतुलित अनुशासन की होती है। यदि माता-पिता समय रहते अपनी गलतियों को समझकर सुधार कर लें, तो बहुत सी समस्याओं को रोका जा सकता है।
अंत में यही कहा जा सकता है कि अच्छी पेरेंटिंग बच्चे के जीवन की दिशा तय करती है। इसका अभाव बच्चे के आत्मविश्वास, भावनाओं, व्यवहार, पढ़ाई और सामाजिक संबंधों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। इसलिए हर माता-पिता को यह समझना चाहिए कि उनका हर शब्द और हर व्यवहार बच्चे के मन पर गहरा असर छोड़ता है। सही मार्गदर्शन और स्नेह के साथ पाला गया बच्चा न केवल सफल, बल्कि संवेदनशील और जिम्मेदार इंसान भी बनता है।

