नई दिल्ली : लोकसभा में शुक्रवार को जो घटनाक्रम हुआ, वह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक मोड़ के रूप में दर्ज किया जाएगा। Narendra Modi के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा लाया गया संविधान संशोधन विधेयक, जिसमें परिसीमन और महिला आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दों को एक साथ जोड़ा गया था, अंततः सदन में पारित नहीं हो सका। वर्ष 2014 के बाद यह पहला अवसर है जब केंद्र की सत्तारूढ़ सरकार को अपने किसी विधेयक पर सीधे लोकसभा में वोटिंग के जरिए हार का सामना करना पड़ा। इससे पहले भूमि अधिग्रहण और कृषि कानूनों जैसे मुद्दों पर सरकार को विरोध का सामना जरूर करना पड़ा था, लेकिन उस तरह की सीधी संसदीय पराजय नहीं हुई थी।
वोटिंग से पहले ही सदन का माहौल काफी तनावपूर्ण हो चुका था। सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेताओं के बीच पर्दे के पीछे लगातार बातचीत चल रही थी। शीर्ष स्तर पर बैठकों का दौर जारी था और सदन के भीतर भी विरोध प्रदर्शन तेज हो गए थे। विपक्ष के नेता Rahul Gandhi के भाषण पर सत्ता पक्ष की तीखी प्रतिक्रिया ने स्थिति को और अधिक गरमा दिया। जब शाम को गृह मंत्री Amit Shah बोलने के लिए खड़े हुए, तब तक यह संकेत मिल चुके थे कि विधेयक के पास होने की संभावना कम है, लेकिन सरकार ने इसे अंत तक वोटिंग के लिए आगे बढ़ाया।
संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 की यह हार सरकार के लिए राजनीतिक रूप से असहज स्थिति पैदा करने वाली मानी जा रही है। यह घटनाक्रम न केवल विपक्ष की एकजुटता को दर्शाता है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि संवैधानिक मुद्दों पर व्यापक सहमति बनाना कितना आवश्यक है। इससे यह स्पष्ट हुआ कि संसद में केवल संख्याबल पर्याप्त नहीं होता, बल्कि राजनीतिक सहमति भी उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
विधेयक की संरचना को लेकर भी कई सवाल उठे। विशेष रूप से इस बात पर विवाद हुआ कि महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे दो अलग-अलग विषयों को एक साथ क्यों जोड़ा गया। विपक्ष ने इसे एक रणनीतिक कदम बताया और आरोप लगाया कि एक मुद्दे की आड़ में दूसरे को आगे बढ़ाने की कोशिश की गई। समाजवादी पार्टी के नेता Akhilesh Yadav सहित कई नेताओं ने इसे पारदर्शिता के खिलाफ बताया।
सरकार के भीतर भी इस विधेयक को लेकर अलग-अलग आकलन सामने आए, हालांकि सत्तारूढ़ गठबंधन के घटक दल इस मुद्दे पर एकजुट दिखाई दिए। भारतीय जनता पार्टी के कुछ नेताओं का मानना था कि इस विधेयक के जरिए महिला मतदाताओं के बीच पार्टी की पकड़ को और मजबूत किया जा सकता था। पिछले कुछ वर्षों में महिलाओं के बीच भाजपा के समर्थन में वृद्धि देखी गई है और इसे उसी दिशा में एक प्रयास माना गया। भले ही विधेयक पारित नहीं हो सका, लेकिन इस बहस ने यह स्पष्ट कर दिया कि कौन-कौन से दल महिला आरक्षण के समर्थन में हैं और किनकी आपत्तियां क्या हैं।
इतिहास में भी ऐसे उदाहरण मिलते हैं जब सरकारों को अपने विधेयकों को पारित कराने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। वर्ष 2002 में Atal Bihari Vajpayee की सरकार द्वारा लाया गया आतंकवाद निरोधक कानून राज्यसभा में पारित नहीं हो सका था, जिसके बाद संयुक्त सत्र बुलाकर उसे पारित कराया गया। इसी तरह Rajiv Gandhi द्वारा लाया गया 64वां संविधान संशोधन राज्यसभा में असफल रहा था, लेकिन बाद में P. V. Narasimha Rao के कार्यकाल में 73वें संशोधन के रूप में पंचायती राज व्यवस्था को संवैधानिक दर्जा मिल सका। ये उदाहरण बताते हैं कि संवैधानिक सुधारों की प्रक्रिया अक्सर जटिल और लंबी होती है।
महिला आरक्षण कानून की मौजूदा स्थिति भी इसी तरह की जटिलताओं से जुड़ी हुई है। वर्ष 2023 में पारित कानून के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान किया गया था, लेकिन इसके लागू होने को जनगणना और परिसीमन से जोड़ दिया गया था। हाल ही में सरकार ने संशोधन लाकर इस व्यवस्था में बदलाव करने का प्रयास किया था, जिसमें लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाकर 850 करने और आरक्षण को तुरंत लागू करने का प्रस्ताव था। हालांकि यह संशोधन पारित नहीं हो सका, जिससे 2023 का मूल कानून यथावत बना रहेगा।
इस मुद्दे पर राजनीतिक मतभेद भी साफ तौर पर सामने आए। विपक्ष ने 2023 के महिला आरक्षण कानून का समर्थन किया, लेकिन नए संशोधन का विरोध किया। Rahul Gandhi ने कहा कि यदि सरकार पहले से पारित कानून को लागू करती है, तो विपक्ष उसका पूरा समर्थन करेगा। वहीं Amit Shah ने विपक्ष पर आरोप लगाया कि उनके रुख के कारण महिलाओं को उनका अधिकार नहीं मिल पा रहा है और यह मुद्दा भविष्य के चुनावों में बड़ा राजनीतिक प्रश्न बन सकता है।
अब नजर इस बात पर टिकी है कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के आगामी विधानसभा चुनावों में यह मुद्दा किस तरह से उठाया जाता है। भारतीय जनता पार्टी ने संकेत दिए हैं कि वह इसे चुनावी मुद्दा बनाएगी और आक्रामक रणनीति अपनाएगी। विभिन्न माध्यमों से यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि सरकार महिला आरक्षण के पक्ष में थी, जबकि विपक्ष के कारण यह विधेयक पारित नहीं हो सका। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि चुनावी मैदान में यह मुद्दा कितना प्रभाव डालता है और क्या यह वास्तव में मतदाताओं के रुझान को प्रभावित कर पाता है।
