(सलीम रज़ा,पत्रकार)
भारत जैसे लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों पर आधारित देश में दिव्यांगजनों के अधिकारों को लेकर कानूनी ढांचा भले ही मजबूत दिखाई देता हो, लेकिन वास्तविकता का आकलन जब जमीन पर किया जाता है तो तस्वीर उतनी सकारात्मक नहीं दिखती। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि अधिकारों और उनके क्रियान्वयन के बीच एक गहरी खाई मौजूद है, और इस खाई का सबसे बड़ा कारण सरकारी उदासीनता, प्रशासनिक लापरवाही और नीतियों के प्रति आधी-अधूरी प्रतिबद्धता है। दिव्यांगजन अधिकारों की बात अक्सर सरकारी भाषणों और दस्तावेजों तक सीमित रह जाती है, जबकि व्यवहार में उन्हें वह सम्मान, अवसर और सुविधाएं नहीं मिल पातीं, जिनका वादा किया गया है।
भारत में दिव्यांगजनों के अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए बनाए गए कानूनों में कई प्रगतिशील प्रावधान शामिल हैं, लेकिन उनकी प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करती है कि उन्हें कितनी गंभीरता से लागू किया जाता है। यही वह बिंदु है जहां सरकार और प्रशासन की संवेदनशीलता की परीक्षा होती है, और दुर्भाग्यवश यही वह क्षेत्र है जहां सबसे अधिक कमी देखने को मिलती है। कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि दिव्यांगजन मुद्दा सरकार की प्राथमिकताओं में कहीं पीछे छूट जाता है, और केवल औपचारिकताओं के स्तर पर ही इसका निर्वहन किया जाता है।
दिव्यांगजनों के लिए बनाई गई योजनाओं का वास्तविक लाभार्थियों तक न पहुंच पाना एक बड़ी समस्या है। इसके पीछे कई कारण हैं, जिनमें जटिल प्रशासनिक प्रक्रियाएं, भ्रष्टाचार, जानकारी का अभाव और अधिकारियों की उदासीनता प्रमुख हैं। अनेक मामलों में यह देखा गया है कि पात्र व्यक्ति महीनों तक सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाते रहते हैं, लेकिन उन्हें समय पर सहायता नहीं मिल पाती। यह स्थिति न केवल उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति को कमजोर करती है, बल्कि उनके आत्मसम्मान को भी ठेस पहुंचाती है।
सरकारी ढांचे में समन्वय की कमी भी एक गंभीर समस्या है। विभिन्न विभागों के बीच तालमेल का अभाव योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन में बाधा बनता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी योजना में स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक कल्याण विभागों की संयुक्त भूमिका हो, तो उनके बीच समन्वय की कमी के कारण योजना का उद्देश्य अधूरा रह जाता है। इस प्रकार की व्यवस्थागत कमजोरियां यह दर्शाती हैं कि सरकार ने दिव्यांगजनों के मुद्दे को एक समग्र दृष्टिकोण से नहीं देखा है।
उत्तराखण्ड की स्थिति इस संदर्भ में और भी चिंताजनक नजर आती है। राज्य गठन के इतने वर्षों बाद भी दिव्यांगजनों के लिए एक स्पष्ट और व्यापक नीति का अभाव यह संकेत देता है कि इस वर्ग के प्रति सरकार की प्राथमिकता सीमित रही है। पहाड़ी राज्य होने के कारण यहां पहले से ही जीवन की चुनौतियां अधिक हैं, लेकिन दिव्यांगजनों के लिए इन चुनौतियों को कम करने की दिशा में ठोस प्रयास अपेक्षित स्तर पर नहीं दिखते।
राज्य में कई बार यह देखने को मिला है कि दिव्यांगजनों से जुड़ी घोषणाएं तो की जाती हैं, लेकिन उनका क्रियान्वयन या तो बहुत धीमा होता है या फिर अधूरा रह जाता है। योजनाओं के लिए पर्याप्त बजट का अभाव भी एक बड़ी समस्या है। कई योजनाएं केवल इसलिए प्रभावी नहीं हो पातीं क्योंकि उनके लिए आवश्यक वित्तीय संसाधन उपलब्ध नहीं कराए जाते। इससे यह धारणा बनती है कि सरकार इन योजनाओं को केवल औपचारिकता के रूप में लागू कर रही है, न कि वास्तविक परिवर्तन के उद्देश्य से।
सुलभता के क्षेत्र में भी स्थिति संतोषजनक नहीं है। सरकारी कार्यालयों, अस्पतालों और शैक्षणिक संस्थानों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव यह दर्शाता है कि दिव्यांगजनों की जरूरतों को गंभीरता से नहीं लिया गया। कई भवनों में आज भी रैंप, लिफ्ट या विशेष शौचालय जैसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। यह स्थिति न केवल कानून के उल्लंघन को दर्शाती है, बल्कि सरकार की प्रतिबद्धता पर भी सवाल खड़े करती है।
शिक्षा के क्षेत्र में भी सरकारी उदासीनता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। समावेशी शिक्षा की बात तो की जाती है, लेकिन इसके लिए आवश्यक संसाधनों और प्रशिक्षण का अभाव है। शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रमों में दिव्यांगजनों की जरूरतों को लेकर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता, जिससे कक्षा में उन्हें उचित सहयोग नहीं मिल पाता। परिणामस्वरूप, कई दिव्यांग विद्यार्थी शिक्षा से वंचित रह जाते हैं या बीच में ही पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं।
रोजगार के क्षेत्र में आरक्षण की व्यवस्था होने के बावजूद, उसका पूर्ण रूप से पालन नहीं किया जाता। कई सरकारी विभागों में आरक्षित पद खाली पड़े रहते हैं, लेकिन उन्हें भरने के लिए गंभीर प्रयास नहीं किए जाते। निजी क्षेत्र में तो स्थिति और भी चिंताजनक है, जहां दिव्यांगजनों को रोजगार देने के लिए कोई सख्त बाध्यता नहीं है। इससे यह स्पष्ट होता है कि सरकार ने रोजगार के क्षेत्र में भी इस वर्ग के लिए पर्याप्त अवसर सुनिश्चित नहीं किए हैं।
दिव्यांगजनों के प्रति सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों का रवैया भी कई बार संवेदनहीन होता है। कई मामलों में यह देखा गया है कि उन्हें सम्मानजनक व्यवहार नहीं मिलता, और उनकी समस्याओं को गंभीरता से नहीं लिया जाता। यह केवल व्यक्तिगत व्यवहार का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह पूरे प्रशासनिक तंत्र में संवेदनशीलता की कमी को दर्शाता है।
उत्तराखण्ड में भौगोलिक परिस्थितियों के कारण दिव्यांगजनों को अतिरिक्त कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, लेकिन सरकार ने इन विशेष परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए कोई विशेष रणनीति विकसित नहीं की है। ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वाले दिव्यांगजन आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं, और उन्हें सरकारी सहायता तक पहुंचने में भारी कठिनाई होती है।
इस पूरे परिदृश्य में सबसे चिंताजनक बात यह है कि दिव्यांगजनों की आवाज को नीति निर्माण में पर्याप्त स्थान नहीं दिया जाता। उनके अनुभवों और सुझावों को शामिल किए बिना बनाई गई नीतियां अक्सर उनकी वास्तविक जरूरतों को पूरा नहीं कर पातीं। यह स्थिति यह दर्शाती है कि सरकार ने अभी तक इस वर्ग को केवल लाभार्थी के रूप में देखा है, न कि भागीदार के रूप में।
समाज में जागरूकता की कमी भी सरकारी उदासीनता का ही एक परिणाम है। यदि सरकार इस मुद्दे को गंभीरता से लेती, तो व्यापक स्तर पर जागरूकता अभियान चलाए जाते, जिससे समाज का दृष्टिकोण बदलता। लेकिन इस दिशा में भी प्रयास सीमित ही दिखाई देते हैं।
हालांकि यह भी सच है कि पूरी तस्वीर नकारात्मक नहीं है, और कुछ प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन उनकी गति और प्रभाव अपेक्षित स्तर पर नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि सरकार अपनी प्राथमिकताओं में इस मुद्दे को ऊपर लाए और केवल घोषणाओं तक सीमित रहने के बजाय ठोस और प्रभावी कदम उठाए।
अंततः यह कहना उचित होगा कि दिव्यांगजनों के अधिकारों का वास्तविक सम्मान तभी संभव है, जब सरकार अपनी जिम्मेदारियों को गंभीरता से निभाए और प्रशासनिक तंत्र को अधिक संवेदनशील और जवाबदेह बनाए। उत्तराखण्ड जैसे राज्य में, जहां भौगोलिक और सामाजिक चुनौतियां पहले से ही मौजूद हैं, वहां इस दिशा में ठोस और ईमानदार प्रयासों की आवश्यकता और भी अधिक है। यदि ऐसा नहीं किया गया, तो कानून और नीतियां केवल कागजों तक सीमित रह जाएंगी, और दिव्यांगजन अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करते रहेंगे।

