( सलीम रज़ा पत्रकार )
मां सिर्फ एक शब्द नहीं, बल्कि वह एहसास है जिसमें पूरी दुनिया का प्यार छिपा होता है। इंसान की जिंदगी की शुरुआत मां की गोद से होती है और उसी की दुआओं के सहारे वह जीवन की कठिन राहों को पार करता है। मां अपने बच्चे के लिए हर दर्द सह लेती है, अपनी इच्छाओं का त्याग कर देती है और अपनी पूरी जिंदगी बच्चों के नाम कर देती है। एक मां कभी अपने लिए नहीं जीती, वह हमेशा अपने परिवार और बच्चों की खुशियों में ही अपनी खुशी तलाशती है। यही कारण है कि दुनिया में मां का स्थान सबसे ऊंचा माना गया है।
आज के आधुनिक दौर में इंसान बहुत आगे निकल चुका है। विज्ञान और तकनीक ने जिंदगी को आसान बना दिया है, लेकिन रिश्तों की गर्माहट कहीं न कहीं कम होती जा रही है। पहले परिवारों में अपनापन हुआ करता था। संयुक्त परिवारों में मां-बाप, दादा-दादी और बच्चे सब साथ रहते थे। घर में बुजुर्गों की मौजूदगी आशीर्वाद मानी जाती थी। मां की आवाज पूरे घर को जोड़कर रखती थी। लेकिन समय के साथ परिस्थितियां बदल गईं। अब लोग अपने करियर, नौकरी और भागदौड़ भरी जिंदगी में इतने व्यस्त हो गए हैं कि उनके पास अपने मां-बाप के लिए समय ही नहीं बचता।
आज कई मां-बाप अपने ही घरों में अकेलेपन का जीवन जी रहे हैं। जिन बच्चों को उन्होंने उंगली पकड़कर चलना सिखाया, वही बच्चे बड़े होकर उनसे दूर हो जाते हैं। कोई नौकरी के कारण दूसरे शहर चला जाता है तो कोई विदेश में बस जाता है। पीछे रह जाते हैं बूढ़े मां-बाप, जिनकी आंखें हर दिन अपने बच्चों के इंतजार में दरवाजे की ओर लगी रहती हैं। उनके पास सब कुछ होता है, लेकिन अपने बच्चों का साथ नहीं होता। यही तन्हाई धीरे-धीरे उनके जीवन का सबसे बड़ा दर्द बन जाती है।
आजकल लोग सोशल मीडिया पर मदर्स डे के मौके पर अपनी मां के साथ तस्वीरें डालते हैं, बड़े-बड़े संदेश लिखते हैं और दुनिया को दिखाते हैं कि वे अपनी मां से कितना प्यार करते हैं। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या हम सच में अपनी मां को वह सम्मान और समय दे पा रहे हैं जिसकी वह हकदार हैं? क्या हम रोज कुछ पल अपनी मां के साथ बैठते हैं? क्या हम उनकी भावनाओं को समझते हैं? क्या हम उनकी तकलीफों को महसूस करते हैं? अगर नहीं, तो केवल एक दिन की शुभकामनाएं और दिखावा किसी काम का नहीं।
मां-बाप को महंगे उपहारों की जरूरत नहीं होती। उन्हें सिर्फ अपने बच्चों का साथ चाहिए होता है। वे चाहते हैं कि कोई उनसे प्यार से बात करे, उनकी बातों को सुने, उनके साथ बैठकर दो पल बिताए। बुढ़ापे में इंसान फिर से बच्चे जैसा हो जाता है। उसे सहारे, प्यार और अपनापन की जरूरत होती है। लेकिन आज की व्यस्त जिंदगी में लोग अपने मां-बाप को समय देने से भी कतराने लगे हैं। यही कारण है कि समाज में बुजुर्गों का अकेलापन बढ़ता जा रहा है।
वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या आज के समाज की सबसे बड़ी सच्चाई बन चुकी है। यह केवल एक इमारत नहीं, बल्कि उन टूटे हुए दिलों का घर है जिन्हें अपने ही बच्चों ने अकेला छोड़ दिया। जिन मां-बाप ने पूरी जिंदगी अपने बच्चों के भविष्य के लिए संघर्ष किया, वही अपने अंतिम समय में अपनों के प्यार के लिए तरस जाते हैं। यह केवल परिवारों की नहीं, बल्कि पूरे समाज की संवेदनहीनता को दर्शाता है।
मां का त्याग कभी चुकाया नहीं जा सकता। जब बच्चा बीमार होता है तो मां रातभर जागती है। जब बच्चा दुखी होता है तो सबसे ज्यादा दर्द मां को होता है। मां खुद भूखी रह सकती है, लेकिन अपने बच्चे को भूखा नहीं देख सकती। दुनिया में शायद ही कोई रिश्ता इतना निस्वार्थ होता है। इसलिए मां-बाप का सम्मान करना केवल हमारा कर्तव्य नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और इंसानियत की पहचान है।
आज जरूरत इस बात की है कि नई पीढ़ी को संस्कार दिए जाएं। बच्चों को बचपन से सिखाया जाए कि मां-बाप का सम्मान सबसे बड़ा धर्म है। अगर घर में बच्चे अपने बड़ों का सम्मान होते हुए देखेंगे, तभी वे आगे चलकर अपने माता-पिता की इज्जत करेंगे। जिस घर में बुजुर्ग खुश रहते हैं, वहां हमेशा सुख और शांति बनी रहती है।
मदर्स डे केवल एक दिन नहीं होना चाहिए। मां का सम्मान हर दिन होना चाहिए। अगर हम सच में अपनी मां से प्यार करते हैं, तो हमें उन्हें कभी अकेला महसूस नहीं होने देना चाहिए। हमें उनके साथ समय बिताना चाहिए, उनकी सेहत का ध्यान रखना चाहिए और उन्हें यह एहसास दिलाना चाहिए कि वे हमारे जीवन की सबसे बड़ी ताकत हैं।
आज इस मदर्स डे पर हमें केवल शुभकामनाएं देने की नहीं, बल्कि एक संकल्प लेने की जरूरत है कि हम अपने मां-बाप की इज्जत करेंगे, उन्हें समय देंगे और उनकी तन्हाई को दूर करने का प्रयास करेंगे। क्योंकि मां-बाप की मुस्कान से बढ़कर इस दुनिया में कोई दौलत नहीं होती। जिस घर में मां खुश रहती है, उस घर में भगवान का वास होता है।

