(सलीम रज़ा पत्रकार)
(व्यंग्य)
सुबह के नौ बजे हैं। शहर की सड़कें वैसे ही गाड़ियों से भरी पड़ी हैं जैसे किसी मेले में मुफ्त जलेबी बंट रही हो। हर आदमी अपनी कार में अकेला बैठा है और चेहरे पर ऐसा भाव है मानो देश की अर्थव्यवस्था का पूरा भार उसी की एसयूवी उठा रही हो। पेट्रोल पंप पर लंबी लाइनें हैं, लोग तेल ऐसे भरवा रहे हैं जैसे अगला विश्वयुद्ध पेट्रोल की टंकी में ही लड़ा जाना हो। इसी बीच सरकार ने सुझाव दिया कि सप्ताह में एक दिन “नो व्हीकल डे” मनाया जाए ताकि ईंधन बचाया जा सके। बस फिर क्या था, देश में ऐसा माहौल बन गया जैसे सरकार ने लोगों से गाड़ी नहीं, उनकी आज़ादी छीनने की घोषणा कर दी हो।
लोगों ने तुरंत गणित लगाना शुरू कर दिया। एक सज्जन बोले, “अगर मैं एक दिन कार नहीं चलाऊँगा तो ऑफिस कैसे जाऊँगा?” उनसे पूछा गया कि ऑफिस घर से कितनी दूर है तो बोले, “बस डेढ़ किलोमीटर।” अब उन्हें कौन समझाए कि उनके दादा जी इसी दूरी को खेत जाते हुए वार्मअप मानते थे। लेकिन आधुनिक इंसान के लिए डेढ़ किलोमीटर पैदल चलना वैसा ही कठिन कार्य है जैसे संसद में बिना शोर-शराबे के बहस कर लेना।
कुछ लोगों को यह योजना इसलिए पसंद नहीं आई क्योंकि उन्हें डर है कि अगर सप्ताह में एक दिन गाड़ी बंद रही तो पड़ोसी को कैसे पता चलेगा कि उन्होंने नई कार खरीदी है। हमारे यहां गाड़ी केवल यात्रा का साधन नहीं, सामाजिक प्रतिष्ठा का चलता-फिरता विज्ञापन भी है। मोहल्ले में कई लोग तो कार इसलिए निकालते हैं ताकि दूध लेने जाते समय चार लोग देख लें कि “इनकी भी तरक्की हो गई है।” अब सरकार कह रही है कि सप्ताह में एक दिन गाड़ी घर में ही खड़ी रखो। यह बात कुछ लोगों को वैसी ही लगी जैसे किसी अभिनेता से कहा जाए कि एक दिन इंस्टाग्राम पर फोटो मत डालो।
सरकार का तर्क बड़ा सीधा है। देश हर साल अरबों रुपये का ईंधन आयात करता है। पेट्रोल और डीज़ल की बढ़ती खपत केवल जेब पर ही नहीं, पर्यावरण पर भी भारी पड़ रही है। लेकिन जनता को पर्यावरण की चिंता उतनी ही होती है जितनी परीक्षा खत्म होने के बाद विद्यार्थी को किताबों की। जब तक सांस लेने में दिक्कत न होने लगे, तब तक धुआं भी लोगों को विकास का प्रतीक लगता है। सड़क पर जितना अधिक जाम होगा, उतना ही लोगों को विश्वास होता है कि देश तरक्की कर रहा है।
नो व्हीकल डे के विरोध में सबसे मजेदार तर्क यह आया कि “एक दिन गाड़ी बंद रखने से क्या फर्क पड़ेगा?” यही तर्क अगर हर क्षेत्र में लागू कर दिया जाए तो फिर कोई टैक्स भी न दे, क्योंकि एक आदमी के टैक्स न देने से क्या फर्क पड़ेगा। कोई बिजली बचाने के लिए पंखा बंद न करे, क्योंकि एक पंखे से क्या फर्क पड़ेगा। समस्या यही है कि हम सामूहिक जिम्मेदारी को हमेशा दूसरे के हिस्से का काम मानते हैं। हमें लगता है कि देश तभी सुधरेगा जब बाकी लोग सुधार करेंगे।
दिलचस्प बात यह है कि वही लोग जो पेट्रोल के बढ़ते दामों पर सबसे ज्यादा दुखी दिखाई देते हैं, वे ही छोटी-सी दूरी के लिए भी बाइक स्टार्ट कर देते हैं। मोहल्ले की दुकान घर से बीस कदम दूर हो, तब भी गाड़ी ऐसे निकलेगी जैसे लद्दाख अभियान पर जा रहे हों। कई लोग तो सुबह की सैर के लिए पार्क तक भी स्कूटर से जाते हैं। वहां पहुंचकर फिटनेस पर चर्चा करते हैं और फिर लौटते समय समोसे पैक करवा लेते हैं।
अगर सचमुच सप्ताह में एक दिन नो व्हीकल डे लागू हो जाए तो कई सकारात्मक बदलाव दिखाई दे सकते हैं। सड़कें कुछ शांत होंगी, हवा थोड़ी साफ होगी, हॉर्न का शोर कम होगा और शायद लोगों को यह भी याद आएगा कि पैदल चलना कोई अपराध नहीं है। बच्चों को पता चलेगा कि साइकिल केवल जिम की मशीन नहीं, असली सड़क पर भी चलाई जाती है। पड़ोसी एक-दूसरे से बात करेंगे क्योंकि हर समय शीशा बंद करके एसी में बैठने की मजबूरी नहीं रहेगी।
हालांकि कुछ लोग इस योजना का भी जुगाड़ निकाल लेंगे। जैसे कई लोग कहेंगे कि “आज मेरी गाड़ी नहीं निकलेगी,” और फिर पत्नी की गाड़ी निकाल लेंगे। कुछ लोग ऑफिस में यह प्रमाणपत्र मांगेंगे कि उनकी कुर्सी इतनी महत्वपूर्ण है कि उनके बिना देश रुक जाएगा, इसलिए उन्हें नो व्हीकल डे से छूट दी जाए। कुछ लोग सोशल मीडिया पर फोटो डालेंगे—“देखिए, आज मैं मेट्रो से सफर कर रहा हूं”—मानो उन्होंने चंद्रयान मिशन में योगदान दे दिया हो।
असल समस्या केवल ईंधन की नहीं, हमारी आदतों की है। हमने सुविधा को आवश्यकता और दिखावे को जीवनशैली बना लिया है। हम चाहते हैं कि सड़कें खाली रहें, लेकिन अपनी गाड़ी घर से न निकले यह मंजूर नहीं। हम चाहते हैं कि पेट्रोल सस्ता हो, लेकिन खपत कम करने की बात आते ही हमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता खतरे में नजर आने लगती है। यही कारण है कि हर नई योजना पर बहस ज्यादा और पालन कम होता है।
नो व्हीकल डे केवल सरकार की योजना नहीं, यह हमारे व्यवहार का आईना भी हो सकता है। यह हमें याद दिला सकता है कि विकास का मतलब केवल ज्यादा गाड़ियां नहीं, बेहतर जीवन भी है। अगर सप्ताह में एक दिन हम अपनी कार या बाइक को आराम दे दें तो शायद शहर भी राहत की सांस ले सके। और हो सकता है कि उस एक दिन हमें यह एहसास हो जाए कि इंसान के पैर केवल एक्सीलेटर दबाने के लिए नहीं बने थे।
