देहरादून: उत्तराखंड की राजनीति के एक सादगीपूर्ण और अनुशासित चेहरे के रूप में पहचाने जाने वाले भुवन चंद्र खंडूड़ी के निधन से पूरे प्रदेश में शोक का माहौल है। लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे खंडूड़ी ने आज अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर सामने आते ही राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई। पिछले कई दिनों से उनके आवास पर नेताओं, शुभचिंतकों और परिजनों का लगातार आना-जाना लगा हुआ था।
सेना से रिटायर होने के बाद राजनीति में आए खंडूड़ी को राष्ट्रीय राजनीति में आगे बढ़ाने का श्रेय पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को दिया जाता है। 1990 के दशक में उन्होंने भाजपा के साथ सक्रिय राजनीति की शुरुआत की और जल्द ही अपनी साफ छवि, ईमानदार कार्यशैली तथा प्रशासनिक क्षमता के कारण पार्टी नेतृत्व का भरोसा जीत लिया। पहली बार लोकसभा पहुंचने के कुछ ही समय बाद उन्हें पार्टी का मुख्य सचेतक बनाया गया, जो उनके प्रति केंद्रीय नेतृत्व के विश्वास को दर्शाता था।
हालांकि 1996 के लोकसभा चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा, लेकिन उनकी राजनीतिक यात्रा यहीं नहीं रुकी। वर्ष 1999 में वाजपेयी सरकार में उन्हें सड़क परिवहन मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गई। इस दौरान देशभर में राष्ट्रीय राजमार्गों और सड़कों के विस्तार का बड़ा अभियान चला। आधुनिक हाईवे निर्माण और बेहतर सड़क नेटवर्क को लेकर आज भी खंडूड़ी के कार्यकाल को याद किया जाता है। कहा जाता है कि वाजपेयी ने उन्हें काम करने की पूरी स्वतंत्रता दी थी और इसी वजह से उन्होंने कई बड़े फैसलों को प्रभावी ढंग से लागू किया।
उत्तराखंड राज्य गठन के कुछ वर्षों बाद भाजपा संगठन के भीतर बढ़ती गुटबाजी और राजनीतिक अस्थिरता के बीच पार्टी नेतृत्व ने खंडूड़ी पर भरोसा जताया। वर्ष 2007 में उन्हें राज्य की कमान सौंपी गई। उस समय प्रदेश में राजनीतिक खींचतान तेज थी, लेकिन खंडूड़ी ने प्रशासनिक सख्ती और भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी स्पष्ट छवि के दम पर अलग पहचान बनाई।
2007 से 2009 तक मुख्यमंत्री रहने के बाद उन्हें पद छोड़ना पड़ा, लेकिन जब राज्य में भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अव्यवस्था के मुद्दे उभरने लगे तो भाजपा नेतृत्व ने एक बार फिर उन्हें जिम्मेदारी दी। वर्ष 2011 में वे दोबारा उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने। अपने दोनों कार्यकालों में उन्होंने पारदर्शिता, अनुशासन और जवाबदेही पर जोर दिया।
2014 में केंद्र में भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनने के बाद उन्हें रक्षा मामलों की संसदीय समिति का अध्यक्ष बनाया गया। राजनीतिक जीवन के लंबे सफर में खंडूड़ी ने सादगी, ईमानदारी और कड़े प्रशासनिक फैसलों की जो छवि बनाई, वह उन्हें उत्तराखंड की राजनीति में अलग स्थान दिलाती है। उनके निधन को प्रदेश की राजनीति के एक महत्वपूर्ण अध्याय के अंत के रूप में देखा जा रहा है।
