( सलीम रज़ा पत्रकार )
25 जून 1975 भारतीय लोकतंत्र के इतिहास की वह तारीख है, जिसे याद करते ही देश के राजनीतिक इतिहास का एक ऐसा दौर सामने आ जाता है, जब सत्ता और लोकतंत्र के बीच संतुलन बिगड़ गया था। आज आपातकाल लागू होने के 50 वर्ष पूरे हो चुके हैं, लेकिन उस समय की घटनाएं, फैसले और उनके प्रभाव आज भी चर्चा का विषय बने हुए हैं। भारतीय लोकतंत्र ने अपने लंबे सफर में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं, लेकिन आपातकाल का दौर उन सबसे अलग और सबसे अधिक विवादित माना जाता है। यह केवल एक राजनीतिक घटना नहीं थी, बल्कि करोड़ों भारतीयों के जीवन, उनके अधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों को प्रभावित करने वाला समय था।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहां संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता, न्याय और व्यक्तिगत अधिकारों की गारंटी देता है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी यह होती है कि जनता अपनी बात खुलकर कह सकती है, सरकार की आलोचना कर सकती है और अपने अधिकारों के लिए आवाज उठा सकती है। लेकिन 25 जून 1975 की रात देश ने एक ऐसी स्थिति देखी, जब इन अधिकारों पर व्यापक प्रतिबंध लगा दिए गए। आपातकाल की घोषणा के साथ ही लोकतंत्र की सामान्य प्रक्रियाएं प्रभावित होने लगीं और सत्ता का केंद्रीकरण बढ़ गया।
उस समय देश में राजनीतिक परिस्थितियां काफी तनावपूर्ण थीं। विभिन्न विपक्षी दल सरकार के खिलाफ आंदोलन चला रहे थे। महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को लेकर जनता में असंतोष बढ़ रहा था। छात्रों, युवाओं और सामाजिक संगठनों के आंदोलन भी तेज हो रहे थे। ऐसे माहौल में सरकार ने देश की आंतरिक सुरक्षा और स्थिरता को आधार बनाकर आपातकाल लागू करने का फैसला लिया। हालांकि विपक्ष और अनेक राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ कदम बताया।
आपातकाल लागू होने के बाद सबसे बड़ा असर नागरिक स्वतंत्रताओं पर पड़ा। संविधान द्वारा दिए गए कई मौलिक अधिकारों को सीमित कर दिया गया। आम नागरिकों के लिए अपनी बात खुलकर कहना कठिन हो गया। सरकार के खिलाफ आवाज उठाने वालों पर कार्रवाई होने लगी। लोगों के मन में यह डर बैठ गया कि कहीं उनके विचार या बयान उनके लिए परेशानी का कारण न बन जाएं। लोकतंत्र में जहां सरकार और जनता के बीच संवाद महत्वपूर्ण होता है, वहीं उस समय भय और नियंत्रण का माहौल दिखाई देने लगा।
मीडिया पर भी अभूतपूर्व नियंत्रण स्थापित किया गया। समाचार पत्रों, पत्रिकाओं और अन्य प्रकाशनों पर सेंसरशिप लागू कर दी गई। किसी भी खबर को प्रकाशित करने से पहले सरकारी अनुमति की आवश्यकता पड़ती थी। सरकार की आलोचना करने वाली खबरों को रोका जाता था। कई पत्रकारों और संपादकों ने इस दौर को भारतीय पत्रकारिता का सबसे कठिन समय बताया है। कुछ अखबारों ने विरोध दर्ज कराने के लिए अपने संपादकीय कॉलम खाली छोड़ दिए, जबकि कई संस्थानों को दबाव का सामना करना पड़ा। लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तंभ कहा जाता है, लेकिन उस दौर में इस स्तंभ की स्वतंत्रता गंभीर रूप से प्रभावित हुई।
राजनीतिक विपक्ष पर भी कड़ी कार्रवाई हुई। अनेक प्रमुख विपक्षी नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आंदोलनकारियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। हजारों लोगों को बिना मुकदमे के हिरासत में रखा गया। लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष की भूमिका सरकार को जवाबदेह बनाने की होती है, लेकिन उस समय विपक्ष की गतिविधियों पर व्यापक रोक लगा दी गई। इससे राजनीतिक बहस और संवाद की प्रक्रिया कमजोर पड़ गई।
आपातकाल के दौरान न्यायपालिका की भूमिका को लेकर भी बहस हुई। नागरिक अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आए। लोगों को यह महसूस हुआ कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और मजबूती कितनी महत्वपूर्ण होती है। यही कारण है कि बाद के वर्षों में संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं को और अधिक मजबूत बनाने की दिशा में कई कदम उठाए गए।
इस दौर में प्रशासनिक स्तर पर भी बड़े बदलाव देखने को मिले। सरकार ने अनुशासन और विकास के नाम पर कई अभियान चलाए। कुछ लोगों का मानना था कि सरकारी दफ्तरों में कामकाज की गति बढ़ी और प्रशासन अधिक सक्रिय दिखाई दिया। रेल सेवाओं, कार्यालयों और अन्य सार्वजनिक व्यवस्थाओं में समयपालन पर विशेष जोर दिया गया। लेकिन आलोचकों का कहना था कि यदि अनुशासन नागरिक स्वतंत्रता की कीमत पर स्थापित किया जाए तो वह लोकतांत्रिक भावना के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
आपातकाल के दौरान चलाए गए परिवार नियोजन कार्यक्रम ने भी व्यापक विवाद पैदा किया। जनसंख्या नियंत्रण के उद्देश्य से नसबंदी अभियान को तेज किया गया। कई क्षेत्रों से ऐसी शिकायतें सामने आईं कि लोगों पर दबाव बनाकर नसबंदी कराई गई। गरीब और कमजोर वर्गों को इस अभियान का सबसे अधिक प्रभाव झेलना पड़ा। यह मुद्दा बाद में जनता के बीच सरकार के प्रति नाराजगी का एक बड़ा कारण बना।
ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में लोगों ने अलग-अलग तरीके से इस दौर को महसूस किया। गांवों में सरकारी मशीनरी का प्रभाव बढ़ा, जबकि शहरों में राजनीतिक गतिविधियों और सार्वजनिक चर्चाओं पर नियंत्रण दिखाई दिया। आम नागरिकों के लिए यह समझना कठिन था कि वे अपनी असहमति किस प्रकार व्यक्त करें। लोगों के मन में यह भावना पैदा होने लगी कि लोकतंत्र की मूल आत्मा कहीं न कहीं कमजोर पड़ रही है।
हालांकि आपातकाल के समर्थकों का तर्क था कि यह कदम देश में स्थिरता बनाए रखने और प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करने के लिए आवश्यक था, लेकिन इसके विरोधियों का कहना था कि किसी भी परिस्थिति में नागरिक अधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर नहीं किया जाना चाहिए। यही बहस आज भी इतिहासकारों, राजनीतिक विशेषज्ञों और आम लोगों के बीच जारी है।
मार्च 1977 में जब आम चुनाव कराए गए तो जनता को अपनी राय व्यक्त करने का अवसर मिला। चुनाव परिणामों ने भारतीय लोकतंत्र की ताकत को दुनिया के सामने प्रदर्शित किया। मतदाताओं ने अपने मताधिकार का उपयोग करते हुए स्पष्ट संदेश दिया कि लोकतंत्र में अंतिम शक्ति जनता के पास होती है। सत्ता परिवर्तन हुआ और आपातकाल समाप्त हो गया। यह घटना इस बात का प्रमाण बनी कि भारतीय लोकतंत्र की जड़ें कितनी गहरी हैं।
आपातकाल समाप्त होने के बाद देश में लोकतांत्रिक संस्थाओं को और अधिक मजबूत बनाने पर जोर दिया गया। संविधान में ऐसे संशोधन किए गए, जिनका उद्देश्य भविष्य में इस प्रकार की परिस्थितियों को रोकना और नागरिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करना था। प्रेस की स्वतंत्रता, न्यायपालिका की स्वायत्तता और नागरिक अधिकारों के महत्व पर नई चर्चा शुरू हुई। यह एहसास और गहरा हुआ कि लोकतंत्र केवल एक शासन प्रणाली नहीं, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें जनता की भागीदारी, स्वतंत्रता और अधिकार सर्वोपरि होते हैं।
आज, जब आपातकाल के पांच दशक पूरे हो चुके हैं, तब यह केवल इतिहास की एक घटना नहीं बल्कि लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी और सीख है। यह हमें याद दिलाता है कि सत्ता चाहे कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, उसे संविधान और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के भीतर रहकर ही काम करना चाहिए। लोकतंत्र की असली शक्ति जनता के विश्वास, स्वतंत्र मीडिया, मजबूत न्यायपालिका और सक्रिय नागरिक समाज में निहित होती है।
आपातकाल का स्मरण इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि इतिहास की घटनाएं केवल अतीत की कहानियां नहीं होतीं, वे भविष्य का मार्गदर्शन भी करती हैं। यह दौर हमें सिखाता है कि नागरिक अधिकारों की रक्षा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान और लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती किसी भी राष्ट्र के स्वस्थ विकास के लिए अनिवार्य है। यदि इन मूल्यों को कमजोर किया जाता है, तो लोकतंत्र की आत्मा प्रभावित होती है।
पचास वर्ष बाद भी 25 जून 1975 का वह दिन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक ऐसे अध्याय के रूप में दर्ज है, जिसे भुलाया नहीं जा सकता। यह दिन याद दिलाता है कि लोकतंत्र केवल संविधान की किताबों में लिखे शब्दों से जीवित नहीं रहता, बल्कि उन नागरिकों की जागरूकता से मजबूत होता है जो अपने अधिकारों, कर्तव्यों और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति सजग रहते हैं। आपातकाल की याद इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमें लगातार सचेत करती है कि स्वतंत्रता और लोकतंत्र की रक्षा हमेशा सतर्कता, जिम्मेदारी और जनभागीदारी से ही संभव है। यही उस काले दौर से मिली सबसे बड़ी सीख है, जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी पांच दशक पहले थी।

