मेरठ: सौरभ हत्याकांड में मृत्युदंड की सजा सुनाए जाने के बाद मुस्कान रस्तोगी और साहिल की जेल में दिनचर्या बदलने की तैयारी है। अदालत का विस्तृत आदेश मिलने के बाद दोनों को सजायाफ्ता कैदियों के लिए निर्धारित नियमों के तहत रखा जाएगा। जेल प्रशासन के मुताबिक, मुस्कान को महिला बंदियों की बैरक संख्या 12बी और साहिल को बैरक संख्या 15 में शिफ्ट किया जाएगा। दोनों को कैदी नंबर आवंटित होने के साथ ही निर्धारित पोशाक भी पहननी होगी। मुस्कान क्रीम रंग की साड़ी या सूट में रहेगी, जबकि साहिल को सफेद कुर्ता-पायजामा पहनना होगा।
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वरिष्ठ जेल अधीक्षक डॉ. वीरेश राज शर्मा के अनुसार, जिला अदालत का आदेश मिलने के बाद दोनों की स्थिति विचाराधीन बंदियों से बदलकर सजायाफ्ता कैदियों की हो जाएगी। यदि न्यायालय के आदेश में सश्रम कारावास का प्रावधान होगा, तो नियमानुसार उनसे श्रम भी कराया जा सकता है। फिलहाल साहिल बैरक नंबर 17 में बंद है, जिसे बाद में बैरक नंबर 15 में भेजने की योजना है।
जिला कारागार में इस समय कुल 1,983 बंदी हैं। इनमें 378 सजायाफ्ता कैदी शामिल हैं, जिनमें 16 महिलाएं हैं। महिला बंदियों के लिए बनाई गई बैरक के दो हिस्से हैं। बैरक संख्या 12ए में विचाराधीन महिला बंदियों को रखा जाता है, जबकि 12बी सजायाफ्ता महिलाओं के लिए निर्धारित है।
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सजा सुनाए जाने के बाद दोनों की मुलाकात व्यवस्था में भी बदलाव होगा। अभी तक परिजन महीने में 12 बार उनसे मिल सकते थे, लेकिन नए नियमों के तहत महीने में दो मुलाकात और दो बार फोन पर बातचीत की सुविधा या फिर चार मुलाकातों का विकल्प रहेगा। साहिल से मिलने उसका भाई दिव्यांश और नानी पुष्पा देवी नियमित रूप से जेल पहुंचते रहे हैं। वहीं, जेल प्रशासन के अनुसार, अब तक मुस्कान से मिलने कोई परिजन नहीं आया है।
जेल अधिकारियों का कहना है कि फैसला आने के बाद से मुस्कान और साहिल दोनों मानसिक दबाव में हैं। उनके खानपान में भी बदलाव देखा गया है और वे पहले के मुकाबले लगभग आधा भोजन कर रहे हैं। अन्य बंदियों के साथ बातचीत भी कम हो गई है।
मुस्कान को मृत्युदंड दिए जाने की स्थिति में मथुरा जिला कारागार का नाम भी चर्चा में है। यहां महिला बंदियों के लिए फांसीघर मौजूद है, जिसे प्रदेश का एकमात्र महिला फांसीघर बताया जाता है। जेल अधीक्षक अंशुमन गर्ग के अनुसार, कानूनी प्रक्रिया में कोई बाधा नहीं आने पर मुस्कान को मथुरा जेल में फांसी दी जा सकती है। हालांकि, सत्र न्यायालय द्वारा सुनाई गई मृत्युदंड की सजा पर अमल से पहले उच्च न्यायालय की पुष्टि जरूरी होती है। इसके बाद अपील और दया याचिका जैसी कानूनी प्रक्रियाएं भी हो सकती हैं। ऐसे में फांसी की तारीख का निर्धारण आगे की न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने पर ही संभव होगा।
आजादी के बाद से मथुरा के महिला फांसीघर में किसी महिला को फांसी नहीं दी गई है। अमरोहा के बावनखेड़ी हत्याकांड में दोषी ठहराई गई शबनम को भी मृत्युदंड सुनाया जा चुका है, लेकिन उसकी दया याचिका लंबित होने के कारण सजा पर अमल नहीं हुआ है।
इस बीच मुस्कान के साथ जेल में रह रही उसकी 10 महीने की बेटी राधा को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। वरिष्ठ जेल अधीक्षक डॉ. वीरेश राज शर्मा ने बताया कि जेल मैनुअल के अनुसार, छह साल तक का बच्चा अपनी मां के साथ जेल में रह सकता है। इसलिए फिलहाल बच्ची मुस्कान के साथ ही रहेगी। आगे की स्थिति फांसी की तारीख और संबंधित कानूनी प्रक्रिया के आधार पर तय की जाएगी।
जेल अधिकारियों के मुताबिक, मुस्कान अपनी छोटी बेटी के भविष्य को लेकर परेशान रहती है। वह पिछले तीन-चार दिनों से अपनी सात साल की बड़ी बेटी पीहू से मिलने की इच्छा भी जता रही है, लेकिन जेल के नियमों के चलते अभी तक बड़ी बेटी को उससे मिलवाने नहीं लाया गया है। मुस्कान और साहिल को मेरठ जेल में ही रखा जाएगा या किसी दूसरी जेल में स्थानांतरित किया जाएगा, इस पर भी अदालत का विस्तृत आदेश मिलने के बाद निर्णय होगा।
मुस्कान और साहिल की ओर से पैरवी कर रहीं सरकारी अधिवक्ता रेखा जैन ने कहा कि फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील की जाएगी। उनके मुताबिक, मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया के दौरान उच्च न्यायालय की संबंधित समिति भी प्रकरण पर विचार कर सकती है।
वहीं, अधिवक्ता एसके दीक्षित ने दोनों को मृत्युदंड सुनाए जाने के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि इस तरह के जघन्य अपराध में कठोर सजा दी जानी चाहिए। उनके अनुसार, यह फैसला ऐसे अपराधों के मामलों में एक उदाहरण बन सकता है।

