देहरादून : आंगनबाड़ी केंद्रों के जरिए बच्चों, गर्भवती और धात्री महिलाओं को वितरित किए जा रहे पोषण आहार की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल उठ गए हैं। एनएबीएल से प्रमाणित लैब की जांच रिपोर्ट में सामने आया है कि कई खाद्य पदार्थ तय मानकों पर खरे नहीं उतर रहे हैं और पैकेजिंग में भी गड़बड़ियां की गई हैं।
यह मामला तब सामने आया जब सविन बंसल, जिलाधिकारी देहरादून ने भगवानपुर स्थित गोदाम में छापेमारी की। छापे के दौरान चिप्स, खजूर और अंडों के नमूने लिए गए, जिनकी जांच में कई अनियमितताएं उजागर हुईं। रिपोर्ट के अनुसार, चिप्स और खजूर के सभी नमूनों को “मिसब्रांडेड” घोषित किया गया है। पैकेटों पर दर्ज निर्माण तिथि और एक्सपायरी से जुड़ी जानकारी या तो स्पष्ट नहीं थी या उसमें सीधे छेड़छाड़ के संकेत मिले।
जांच में यह भी सामने आया कि कई पैकेटों पर फरवरी 2025 की निर्माण तिथि को मिटाकर मार्कर से फरवरी 2026 लिख दिया गया था। इससे यह आशंका जताई जा रही है कि पुराने स्टॉक को नई तिथि देकर आंगनबाड़ी केंद्रों तक पहुंचाया गया। केले के चिप्स की गुणवत्ता परीक्षण में भी अनुबंधित मानकों का उल्लंघन पाया गया। तय शर्तों के अनुसार चिप्स में ट्रांसफैट शून्य होना चाहिए था, लेकिन जांच में प्रति 100 ग्राम में 1.30 ग्राम ट्रांसफैट पाया गया। वहीं, प्रोटीन की मात्रा भी निर्धारित 3.1 ग्राम के बजाय केवल 2.5 ग्राम मिली।
अंडों की जांच में भी मानकों की अनदेखी सामने आई। वितरण के लिए न्यूनतम 45 ग्राम वजन तय होने के बावजूद अधिकांश अंडे इस सीमा से कम पाए गए। इससे पोषण आपूर्ति की गुणवत्ता और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
बताया गया है कि महिला सशक्तीकरण एवं बाल विकास विभाग उत्तराखंड द्वारा अनुबंध के तहत दिल्ली की मैसर्स अर्थव इंटरप्राइजेज को राज्य के सभी जनपदों में 105 बाल विकास परियोजनाओं के लिए पोषण आहार आपूर्ति की जिम्मेदारी दी गई है। हालांकि, इस पूरे मामले पर विभागीय स्तर पर स्पष्ट जानकारी का अभाव भी सामने आया है।
महिला एवं बाल सशक्तीकरण विभाग के सचिव चंद्रेश कुमार ने कहा कि भगवानपुर गोदाम पर हुई छापेमारी के बाद उन्हें कोई जानकारी नहीं दी गई है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि किसी प्रकार की लैब जांच रिपोर्ट आई है, तो फिलहाल इसकी जानकारी उन्हें नहीं है।
