(सलीम रज़ा,पत्रकार)
देहरादून : उत्तराखंड की राजधानी ही नहीं, बल्कि प्रदेश की चिकित्सा व्यवस्था का सबसे बड़ा केंद्र भी माना जाता है। पहाड़ से लेकर मैदान तक गंभीर मरीजों के परिजन बेहतर इलाज की उम्मीद लेकर देहरादून पहुंचते हैं। सरकार भी समय-समय पर राजधानी में उपलब्ध आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं, अस्पतालों के विस्तार, नई मशीनों और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार को अपनी उपलब्धियों के तौर पर पेश करती रही है। लेकिन जब राजधानी के किसी अस्पताल में बिजली गुल होने के बाद वेंटिलेटर बंद पड़ जाएं और गंभीर हालत में भर्ती करीब 10 बच्चों की सांसों को एंबू बैग के सहारे बनाए रखने की नौबत आ जाए, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर सरकारी दावों और अस्पताल की जमीनी हकीकत के बीच इतना बड़ा फासला क्यों है।
यह घटना केवल बिजली कटने की घटना नहीं है। बिजली जाना किसी भी शहर या संस्थान में हो सकता है। तकनीकी खराबी हो सकती है, विद्युत आपूर्ति बाधित हो सकती है या किसी आकस्मिक कारण से बिजली बंद हो सकती है। लेकिन अस्पताल ऐसी जगह है जहां बिजली का जाना सामान्य व्यवधान नहीं माना जा सकता। खासकर आईसीयू, एनआईसीयू, पीआईसीयू और वेंटिलेटर पर भर्ती मरीजों के लिए बिजली किसी सुविधा का हिस्सा नहीं बल्कि जीवनरक्षक व्यवस्था का अनिवार्य आधार है। वहां बिजली का एक-एक मिनट महत्वपूर्ण होता है। अगर मुख्य बिजली आपूर्ति बाधित होते ही वैकल्पिक व्यवस्था अपने आप सक्रिय नहीं होती, जनरेटर काम नहीं करता या जीवनरक्षक उपकरणों को तत्काल बैकअप नहीं मिलता, तो मामला सीधे मरीज की जान से जुड़ जाता है।
देहरादून के अस्पताल में जब बिजली व्यवस्था प्रभावित हुई और वेंटिलेटर बंद होने की स्थिति बनी, तब स्वास्थ्यकर्मियों को एंबू बैग के जरिए बच्चों को सांस देने की कोशिश करनी पड़ी। यह दृश्य अपने आप में पूरी व्यवस्था से कई सवाल पूछता है। जिन बच्चों को वेंटिलेटर की आवश्यकता थी, वे स्वयं पर्याप्त रूप से सांस लेने की स्थिति में नहीं थे। ऐसे में वेंटिलेटर का बंद होना महज मशीन का बंद होना नहीं था, बल्कि उनकी सांस की निरंतरता पर संकट था। अस्पताल के डॉक्टरों और कर्मचारियों ने तत्काल एंबू बैग का सहारा लेकर बच्चों को संभालने की कोशिश की, यह निश्चित रूप से उनके प्रयास और जिम्मेदारी को दिखाता है, लेकिन इसी के साथ यह भी सवाल उठता है कि ऐसी स्थिति पैदा ही क्यों हुई।
एक आधुनिक अस्पताल में आपातकालीन बिजली व्यवस्था का उद्देश्य ही यही होता है कि मुख्य बिजली आपूर्ति में व्यवधान आते ही महत्वपूर्ण मशीनों को बिजली मिलती रहे। आईसीयू में लगे वेंटिलेटर, मॉनिटर, ऑक्सीजन सपोर्ट सिस्टम और अन्य उपकरण सामान्य बिजली व्यवस्था पर निर्भर नहीं रह सकते। इनके लिए अलग और भरोसेमंद बैकअप जरूरी होता है। यदि बैकअप व्यवस्था मौजूद होने के बावजूद काम नहीं करती, तो उसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। यदि बैकअप व्यवस्था पर्याप्त नहीं है तो यह उससे भी गंभीर सवाल है। और अगर बैकअप व्यवस्था की नियमित जांच ही नहीं होती तो यह स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि संकट का सामना करने वाले मरीज बच्चे थे। बच्चे किसी भी अस्पताल में सबसे संवेदनशील मरीजों में गिने जाते हैं। गंभीर रूप से बीमार बच्चे की स्थिति कभी भी तेजी से बदल सकती है। ऐसे मरीजों के लिए कुछ मिनट की देरी भी गंभीर परिणाम पैदा कर सकती है। उस समय अस्पताल के स्वास्थ्यकर्मियों ने जिस तरह एंबू बैग के सहारे सांस बनाए रखने की कोशिश की होगी, उसकी कल्पना करना भी भयावह है। एक तरफ मशीन पर निर्भर बच्चों की जिंदगी और दूसरी तरफ बिजली व्यवस्था की अनिश्चितता—यह किसी भी अस्पताल की आपातकालीन तैयारी के लिए सबसे कठिन परीक्षा है।
यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि अगर अस्पताल के कर्मचारी उस समय मौजूद नहीं होते या पर्याप्त संख्या में प्रशिक्षित स्टाफ उपलब्ध नहीं होता तो क्या होता? एक वेंटिलेटर पर भर्ती मरीज को मैनुअल तरीके से सांस देना लगातार निगरानी और प्रशिक्षित हाथों की मांग करता है। अगर एक साथ कई बच्चे प्रभावित हों तो चुनौती कई गुना बढ़ जाती है। ऐसे में अस्पताल की व्यवस्था केवल मशीनों से नहीं बल्कि प्रशिक्षित कर्मचारियों की संख्या, आपातकालीन प्रोटोकॉल और बैकअप सिस्टम की विश्वसनीयता से तय होती है।
यहीं से सरकार के उन दावों पर भी सवाल खड़े होते हैं जिनमें उत्तराखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था को लगातार बेहतर और आधुनिक बताया जाता है। भाजपा सरकार स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार और विकास की बातें करती है। अस्पतालों में नई सुविधाएं आने, स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने और चिकित्सा सेवाओं में सुधार की उपलब्धियां गिनाई जाती हैं। राजनीतिक मंचों पर विकास की तस्वीर अलग दिखाई देती है और सरकारी दावों में ऐसा लगता है कि स्वास्थ्य व्यवस्था लगातार मजबूत हो रही है। लेकिन अस्पताल के आईसीयू में बिजली जाते ही वेंटिलेटर बंद होने की नौबत आए तो जनता यह पूछने का अधिकार रखती है कि आखिर वह मजबूती जमीन पर कहां है।
‘ऑल इज वेल’ कह देने से व्यवस्था ऑल इज वेल नहीं हो जाती। किसी अस्पताल की वास्तविक स्थिति उसके उद्घाटन समारोह, प्रेस विज्ञप्ति या सरकारी विज्ञापन से नहीं बल्कि संकट की घड़ी में सामने आती है। सामान्य दिनों में हर व्यवस्था ठीक दिखाई दे सकती है। असली परीक्षा तब होती है जब बिजली चली जाए, ऑक्सीजन सप्लाई में बाधा आए, कोई मशीन अचानक खराब हो जाए या एक साथ कई मरीजों को आपातकालीन सहायता की जरूरत पड़ जाए। यदि उस समय अस्पताल के पास मजबूत वैकल्पिक व्यवस्था है तो माना जा सकता है कि सिस्टम तैयार है। लेकिन अगर बिजली का संकट ही वेंटिलेटर पर भर्ती मरीजों की जान को खतरे में डाल दे, तो फिर व्यवस्था की मजबूती के दावे खुद कठघरे में खड़े हो जाते हैं।
देहरादून की घटना का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि यह प्रदेश की राजधानी में सामने आई है। अगर राजधानी के बड़े अस्पतालों में बुनियादी आपातकालीन व्यवस्थाओं पर सवाल उठ रहे हैं तो राज्य के दूरदराज के पर्वतीय इलाकों के अस्पतालों के बारे में चिंता और बढ़ जाती है। उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियां पहले से चुनौतीपूर्ण हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में मरीजों को कई किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है। गंभीर स्थिति में मरीजों को अक्सर बड़े अस्पतालों के लिए रेफर किया जाता है। ऐसे में देहरादून जैसे शहर के अस्पतालों पर दबाव और जिम्मेदारी दोनों अधिक होती है।
प्रदेश के गांवों और पहाड़ी इलाकों से आने वाले परिवार देहरादून पहुंचकर यह उम्मीद करते हैं कि यहां कम से कम उन्हें बेहतर और सुरक्षित इलाज मिलेगा। उनके लिए राजधानी का अस्पताल अंतिम उम्मीद जैसा होता है। यदि वहां भी बुनियादी व्यवस्थाएं संकट के समय लड़खड़ा जाएं तो इसका असर केवल एक मरीज पर नहीं पड़ता, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र में जनता के भरोसे पर पड़ता है।
स्वास्थ्य व्यवस्था में सबसे महत्वपूर्ण चीज भरोसा है। मरीज जब अस्पताल पहुंचता है तो वह डॉक्टर और अस्पताल की व्यवस्था पर भरोसा करता है। परिवार अपना बीमार बच्चा डॉक्टरों के हवाले करता है और उम्मीद करता है कि अस्पताल के पास हर आपात स्थिति से निपटने की तैयारी होगी। परिजनों को यह जांचने की क्षमता नहीं होती कि जनरेटर काम कर रहा है या नहीं, ऑक्सीजन बैकअप कितना है, वेंटिलेटर की बैटरी कितनी देर चलेगी या बिजली जाने की स्थिति में वैकल्पिक व्यवस्था कितनी देर में शुरू होगी। यह सब अस्पताल प्रशासन और सरकार की जिम्मेदारी होती है।
इसीलिए इस घटना को केवल ‘बिजली चली गई’ कहकर खत्म कर देना समस्या को छोटा करना होगा। असली सवाल है कि बिजली जाने के बाद अस्पताल ने कितनी तेजी से प्रतिक्रिया दी। कितने समय तक वेंटिलेटर प्रभावित रहे। बैकअप बिजली व्यवस्था क्यों पर्याप्त साबित नहीं हुई। क्या जनरेटर में तकनीकी समस्या थी। क्या वैकल्पिक बिजली लाइन उपलब्ध थी। क्या सभी जीवनरक्षक उपकरणों को बैकअप सप्लाई मिल रही थी। क्या ऐसी स्थिति से निपटने के लिए अस्पताल में लिखित प्रोटोकॉल था और क्या उस पर नियमित मॉक ड्रिल की जाती है। इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होने चाहिए।
अगर अस्पताल प्रशासन की कोई गलती सामने आती है तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। अगर बिजली आपूर्ति कंपनी की समस्या थी तो उसका भी जवाब होना चाहिए। अगर जनरेटर या बैकअप सिस्टम की देखरेख में लापरवाही हुई तो संबंधित अधिकारियों और एजेंसी की जवाबदेही तय होनी चाहिए। अगर उपकरणों की क्षमता पर्याप्त नहीं थी तो स्वास्थ्य विभाग को इसका जवाब देना चाहिए। मरीजों की जान को खतरे में डालने वाली किसी भी कमी को महज तकनीकी खामी कहकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
यह भी देखना जरूरी है कि अस्पतालों में मौजूद महंगी चिकित्सा मशीनों का वास्तविक उपयोग कितना सुरक्षित है। सरकारें अक्सर नई मशीनों की खरीद और अस्पतालों में आधुनिक उपकरण लगाए जाने को उपलब्धि बताती हैं। लेकिन मशीन खरीद लेना ही चिकित्सा व्यवस्था को आधुनिक नहीं बनाता। मशीन चलाने के लिए प्रशिक्षित स्टाफ चाहिए, नियमित रखरखाव चाहिए, बिजली का भरोसेमंद स्रोत चाहिए, स्पेयर पार्ट्स चाहिए और आपात स्थिति में वैकल्पिक व्यवस्था चाहिए। करोड़ों रुपये की मशीन अगर बिजली जाते ही बंद हो जाए और मरीज की सांस हाथ से चलने वाले उपकरण पर निर्भर हो जाए तो मशीन की कीमत से ज्यादा महत्वपूर्ण उसकी संचालन व्यवस्था बन जाती है।
यही वजह है कि स्वास्थ्य बजट को केवल भवनों और उपकरणों की संख्या से नहीं मापा जाना चाहिए। यह भी देखा जाना चाहिए कि अस्पताल चौबीस घंटे कितनी विश्वसनीयता से काम कर सकता है। आईसीयू में कितने वेंटिलेटर वास्तव में चालू हालत में हैं। कितने मॉनिटर काम कर रहे हैं। बिजली का बैकअप कितने घंटे का है। जनरेटर कितनी देर में सक्रिय होता है। ऑक्सीजन की वैकल्पिक व्यवस्था क्या है। आपातकाल में कितने प्रशिक्षित कर्मचारी उपलब्ध होते हैं। यही वास्तविक स्वास्थ्य ढांचे की मजबूती का पैमाना है।
राजधानी के अस्पताल में सामने आई यह स्थिति भाजपा सरकार के लिए राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ज्यादा बड़ी चेतावनी होनी चाहिए। सत्ता किसी भी दल की हो, अस्पताल में भर्ती मरीज को राजनीति से कोई मतलब नहीं होता। आईसीयू में भर्ती बच्चा न भाजपा का होता है, न कांग्रेस का, न किसी अन्य दल का। वह सिर्फ एक मरीज होता है और उसकी जान बचाना सरकार तथा स्वास्थ्य व्यवस्था की सर्वोच्च जिम्मेदारी होती है।
राजनीतिक दलों को भी स्वास्थ्य जैसे संवेदनशील विषय को केवल उपलब्धियों और आरोपों की भाषा में नहीं देखना चाहिए। विपक्ष का काम सवाल उठाना है और सरकार का काम जवाब देना तथा व्यवस्था सुधारना। लेकिन उससे भी ऊपर मरीज की जिंदगी है। यदि कोई कमी सामने आती है तो उसे स्वीकार कर सुधारना ही बेहतर प्रशासन की पहचान है। हर समस्या को छिपाने या उसे सामान्य बताने की कोशिश अंततः जनता के भरोसे को नुकसान पहुंचाती है।
देहरादून की यह घटना यह भी दिखाती है कि स्वास्थ्यकर्मियों पर व्यवस्था की कमियों का बोझ किस तरह पड़ता है। जब मशीन बंद होती है तो मरीज के परिजन डॉक्टर और नर्स को ही जवाबदेह समझते हैं। डॉक्टर और नर्स तत्काल अपनी पूरी क्षमता से मरीज को संभालते हैं, एंबू बैग चलाते हैं, निगरानी करते हैं और जान बचाने की कोशिश करते हैं। लेकिन बिजली व्यवस्था, जनरेटर, उपकरणों का रखरखाव और अस्पताल की आधारभूत संरचना उनके व्यक्तिगत नियंत्रण में नहीं होती। इसलिए स्वास्थ्यकर्मियों की मेहनत की सराहना के साथ उन व्यवस्थागत कमियों की पहचान भी जरूरी है जिनके कारण उन्हें ऐसी आपात स्थिति का सामना करना पड़ा।
सरकार को इस घटना के बाद केवल जांच का आदेश देकर आगे नहीं बढ़ना चाहिए। जांच की रिपोर्ट सार्वजनिक होनी चाहिए और उसमें यह स्पष्ट होना चाहिए कि गलती कहां हुई। प्रदेश के सभी बड़े अस्पतालों में बिजली और ऑक्सीजन बैकअप का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाना चाहिए। आईसीयू, एनआईसीयू और पीआईसीयू जैसे संवेदनशील विभागों में अचानक बिजली बाधित करके यह देखा जाना चाहिए कि बैकअप कितनी जल्दी सक्रिय होता है। जनरेटर की क्षमता और उसकी वास्तविक स्थिति की जांच होनी चाहिए। यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि अस्पताल में मौजूद हर जीवनरक्षक उपकरण वैकल्पिक बिजली व्यवस्था से जुड़ा हो।
इसके साथ ही अस्पतालों में नियमित मॉक ड्रिल की व्यवस्था होनी चाहिए। आपातकालीन स्थिति केवल कागज पर लिखे प्रोटोकॉल से नियंत्रित नहीं होती। जब तक कर्मचारी वास्तविक परिस्थितियों का अभ्यास नहीं करेंगे, तब तक किसी बड़े संकट के समय भ्रम और देरी की आशंका बनी रहेगी। बिजली गुल होने की स्थिति में कौन क्या करेगा, कौन मरीजों की निगरानी करेगा, कौन बैकअप चालू करेगा, कौन ऑक्सीजन व्यवस्था देखेगा और कौन परिजनों को जानकारी देगा—इन सबकी जिम्मेदारी पहले से तय होनी चाहिए।
यह भी जरूरी है कि मरीजों के परिजनों को सही और समय पर जानकारी दी जाए। अस्पताल में अचानक बिजली गुल हो और वेंटिलेटर बंद हो जाएं तो परिवार के लिए वह क्षण बेहद भयावह होता है। ऐसे समय में पारदर्शिता और संवेदनशील संवाद जरूरी है। अफवाहों और भ्रम की स्थिति पैदा होने से संकट और बढ़ता है।
देहरादून की घटना हमें यह सोचने के लिए मजबूर करती है कि आखिर हम स्वास्थ्य व्यवस्था को किस नजर से देखते हैं। क्या अस्पताल की नई इमारत ही विकास है? क्या महंगी मशीनों की खरीद ही आधुनिक स्वास्थ्य व्यवस्था है? क्या उद्घाटन और घोषणाएं ही उपलब्धि हैं? या फिर असली उपलब्धि यह है कि आधी रात को बिजली चली जाए तब भी आईसीयू की मशीनें चलती रहें, ऑक्सीजन की आपूर्ति बनी रहे और मरीज की जिंदगी पर कोई असर न पड़े?
देहरादून की घटना में करीब 10 बच्चों की सांसों पर संकट की बात सामने आई है। यह आंकड़ा अपने आप में इतना गंभीर है कि किसी भी जिम्मेदार व्यवस्था को तुरंत सक्रिय कर दे। इन बच्चों के परिजन शायद उस समय अस्पताल की व्यवस्था को कोसने के बजाय केवल यह दुआ कर रहे होंगे कि उनके बच्चे की सांस चलती रहे। उनके लिए उस समय कोई राजनीतिक दावा मायने नहीं रखता था। मायने रखता था तो केवल वेंटिलेटर का चलना, ऑक्सीजन का मिलना और डॉक्टरों का उनके बच्चे को बचाने में सक्षम होना।
यही वह अंतर है जिसे सत्ता के गलियारों में समझने की जरूरत है। सरकार के लिए स्वास्थ्य विभाग एक बजट, योजना, परियोजना और उपलब्धि हो सकता है, लेकिन मरीज के परिवार के लिए अस्पताल जिंदगी और मौत के बीच आखिरी सहारा होता है। इसीलिए स्वास्थ्य व्यवस्था में छोटी से छोटी लापरवाही भी बड़ी कीमत वसूल सकती है।
आज जरूरत यह पूछने की है कि देहरादून के इस अस्पताल में जो हुआ, वह केवल एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी या किसी बड़ी व्यवस्थागत कमी का संकेत। अगर यह केवल तकनीकी खराबी थी तो उसे दोबारा होने से रोकने की व्यवस्था क्या है। अगर यह लापरवाही थी तो जिम्मेदार कौन है। अगर बैकअप व्यवस्था मौजूद थी लेकिन विफल रही तो उसका रखरखाव कौन कर रहा था। और अगर बैकअप व्यवस्था ही पर्याप्त नहीं थी तो इतने संवेदनशील अस्पताल को उस स्थिति में क्यों रखा गया?
क्योंकि ‘ऑल इज वेल’ का दावा तब तक खोखला है जब तक अस्पताल की सबसे कमजोर घड़ी में भी व्यवस्था मजबूत साबित न हो। स्वास्थ्य व्यवस्था की असली तस्वीर तब सामने आती है जब कोई वीआईपी अस्पताल का निरीक्षण करने नहीं आया होता, जब कोई कैमरा मौजूद नहीं होता और जब आईसीयू में कोई बच्चा अपनी सांस के लिए मशीन पर निर्भर होता है। उस समय बिजली व्यवस्था का चलना ही असली विकास है। उस समय वेंटिलेटर का लगातार चलना ही असली उपलब्धि है। उस समय डॉक्टर और नर्स को बिना किसी तकनीकी बाधा के इलाज करने देना ही असली सुशासन है।
देहरादून की इस घटना को इसलिए भी गंभीरता से लिया जाना चाहिए कि यह चेतावनी है। आज करीब 10 बच्चों की सांसों पर संकट आया, कल किसी दूसरे अस्पताल में ऐसी स्थिति पैदा हो सकती है। किसी भी सरकार को यह इंतजार नहीं करना चाहिए कि अगली बार कोई बड़ा हादसा हो और तब व्यवस्था सुधारी जाए। रोकथाम ही सबसे अच्छी नीति है।
उत्तराखंड जैसे राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना केवल राजनीतिक आवश्यकता नहीं, सामाजिक और मानवीय जिम्मेदारी है। पहाड़ों से आने वाले मरीजों को देहरादून तक पहुंचने में पहले ही लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। राजधानी में पहुंचने के बाद अगर उन्हें ऐसी व्यवस्था मिले जिसमें बिजली जाने पर वेंटिलेटर तक प्रभावित हो जाएं, तो यह पूरे स्वास्थ्य तंत्र की विश्वसनीयता पर सवाल है।
सरकार को अब दावों से आगे बढ़कर व्यवस्था की बारीकी से समीक्षा करनी होगी। अस्पतालों की बिजली व्यवस्था, ऑक्सीजन सिस्टम, वेंटिलेटर, आईसीयू, जनरेटर, स्टाफ और आपातकालीन प्रोटोकॉल—हर स्तर पर वास्तविक स्थिति की जांच जरूरी है। रिपोर्ट बनाकर अलमारी में रखने के बजाय उसकी कमियों को दूर करना होगा। जहां संसाधनों की कमी है वहां संसाधन देने होंगे, जहां तकनीकी समस्या है वहां उसे ठीक करना होगा और जहां लापरवाही है वहां कार्रवाई करनी होगी।
राजधानी देहरादून में बिजली गुल होने से वेंटिलेटर बंद होने और बच्चों को एंबू बैग के सहारे सांस देने की नौबत ने एक कड़वा सच सामने रखा है। विकास की चमकदार तस्वीर और अस्पताल की आपातकालीन व्यवस्था की वास्तविकता के बीच अगर इतना अंतर है तो उस अंतर को पाटना जरूरी है। सत्ता के लिए यह घटना असहज सवाल जरूर है, लेकिन मरीजों के लिए यह जीवन का सवाल है।
सरकार चाहे इसे तकनीकी समस्या कहे, विपक्ष इसे स्वास्थ्य व्यवस्था की विफलता बताए या अधिकारी इसे आकस्मिक घटना बताकर समझाने की कोशिश करें, जनता के सामने मूल प्रश्न वही रहेगा—अगर बिजली चली जाए तो क्या अस्पताल में इलाज चलता रहेगा?
क्योंकि किसी अस्पताल की सफलता इस बात से नहीं मापी जाती कि उसके पास कितनी मशीनें हैं, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि संकट की घड़ी में उसकी मशीनें कितनी भरोसेमंद हैं। किसी सरकार की सफलता इस बात से नहीं मापी जाती कि उसने कितने अस्पतालों का उद्घाटन किया, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि उन अस्पतालों में भर्ती मरीज कितनी सुरक्षित व्यवस्था में इलाज पा रहे हैं।
देहरादून में बच्चों की सांसों पर आया यह संकट इसलिए सिर्फ एक खबर नहीं है। यह स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने रखा गया आईना है। इस आईने में अगर सरकार को अपनी व्यवस्थागत कमियां दिखाई देती हैं तो उन्हें स्वीकार करना होगा। अगर कमियां नहीं दिखतीं तो फिर यह सवाल और गंभीर है कि आखिर दिखाई क्यों नहीं दे रही हैं।
‘ऑल इज वेल’ कहने से बच्चों की सांसें सुरक्षित नहीं होतीं। सांसें सुरक्षित होती हैं मजबूत बिजली व्यवस्था से, काम करने वाले जनरेटर से, भरोसेमंद वेंटिलेटर से, पर्याप्त ऑक्सीजन से, प्रशिक्षित स्टाफ से और ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था से जो संकट आने से पहले तैयारी पूरी रखे।
अस्पताल में किसी बच्चे की जिंदगी अगर कुछ मिनट की बिजली कटौती से खतरे में पड़ सकती है, तो उस बच्चे के परिवार के लिए यह कोई सामान्य तकनीकी खराबी नहीं है। उनके लिए वह जिंदगी का सबसे भयावह क्षण है। इसलिए अब जरूरत बयानबाजी की नहीं, जवाबदेही की है; उपलब्धियां गिनाने की नहीं, कमियां दूर करने की है; और ‘ऑल इज वेल’ कहने की नहीं, व्यवस्था को वास्तव में ‘ऑल इज वेल’ बनाने की है।
देहरादून की इस घटना से सबक साफ है—स्वास्थ्य व्यवस्था का डंका चाहे जितना पीटा जाए, उसकी असली आवाज तब सुनाई देती है जब अस्पताल की बिजली चली जाती है और किसी बच्चे की सांस वेंटिलेटर पर टिकी होती है। उस वक्त अगर मशीन चलती रहती है तो सिस्टम सफल है, और अगर मशीन बंद पड़ जाती है तथा स्वास्थ्यकर्मियों को हाथ से एंबू बैग चलाकर बच्चे की सांस बचानी पड़ती है, तो फिर सवाल पूछना जरूरी है कि आखिर जिस व्यवस्था को मजबूत बताया जा रहा था, वह संकट की पहली परीक्षा में ही क्यों हांफने लगी।

