शहजहांपुर: शाम ढल रही थी। घर लौटने की जल्दी थी। एक बाइक पर भरोसा था और वक्त बचाने की चाहत। किसी ने नहीं सोचा था कि यह रास्ता आख़िरी बन जाएगा।रोज़ा जंक्शन के पास मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग पर कुछ ही पलों में सब खत्म हो गया। पति-पत्नी, दो मासूम बच्चे और एक युवक—पाँच जिंदगियाँ एक ही झटके में बुझ गईं। ट्रेन की तेज़ रफ्तार ने न सिर्फ़ बाइक को कुचला, बल्कि एक पूरे परिवार के सपनों को भी रौंद दिया।
चार साल की निधि और डेढ़ साल के सूर्या को क्या पता था कि यह सफ़र उन्हें घर नहीं, ख़ामोशी की गोद में ले जा रहा है। माँ-बाप की बाहों में बैठे बच्चे, अगले ही पल उनकी ही आँखों के सामने बिखर गए। घटनास्थल पर बिखरे खिलौने, चप्पलें और खून—सब गवाही दे रहे थे कि मौत कितनी बेरहम हो सकती है।कुछ लोग चिल्लाए, आवाज़ दी, हाथ हिलाए… मगर ट्रेन के शोर में इंसानी पुकार दब गई। एक पल की देर, एक सेकेंड की चूक, और पाँच घरों में हमेशा के लिए अंधेरा छा गया।
जब परिजन पहुँचे, तो पहचान मुश्किल थी। पिता लालाराम की चीख़ें पटरी पर गूँज रही थीं। जिन बच्चों को उन्होंने गोद में खिलाया था, आज उन्हीं के शव देखकर उनके पाँव जवाब दे गए। आसपास खड़े लोग आँखें नहीं मिला पा रहे थे—हर किसी की आँख नम थी, हर दिल भारी।
यह हादसा सिर्फ़ एक खबर नहीं है। यह चेतावनी है—कि शॉर्टकट कभी-कभी ज़िंदगी को छोटा कर देता है। मानवरहित क्रॉसिंग पर ली गई एक जल्दबाज़ी ने एक हँसते-खेलते परिवार को हमेशा के लिए तस्वीरों में कैद कर दिया।आज रोज़ा की उस पटरी पर ट्रेनें फिर चल रही हैं, शोर फिर लौट आया है।लेकिन उस पिता के घर में, उस माँ की रसोई में, और उन बच्चों के खिलौनों के बीच—अब सिर्फ़ सन्नाटा है।
