ईरान एक बार फिर इतिहास के निर्णायक मोड़ पर खड़ा दिखाई दे रहा है। सड़कों पर उमड़ती भीड़, सत्ता के खिलाफ बुलंद होते नारे और युवाओं की बढ़ती भागीदारी ने 1979 की इस्लामिक क्रांति की स्मृतियों को ताजा कर दिया है। फर्क सिर्फ इतना है कि तब मजहबी कट्टरपंथ के नाम पर सत्ता बदली गई थी, और आज उसी कट्टरपंथी व्यवस्था को उखाड़ फेंकने की आवाज़ उठ रही है।
28 दिसंबर से शुरू हुआ यह विरोध प्रदर्शन शुरुआत में महंगाई, बेरोजगारी और ईरानी मुद्रा रियाल की गिरती कीमत के खिलाफ था, लेकिन तीन दिन के भीतर ही यह आंदोलन खुले तौर पर सरकार और धार्मिक नेतृत्व के विरोध में बदल गया। तेहरान, मशहद, इस्फहान, हमदान, जंजान और मालार्ड जैसे बड़े शहरों में हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। विश्वविद्यालय परिसरों और व्यावसायिक इलाकों ने आंदोलन के केंद्र का रूप ले लिया है।
प्रदर्शनकारियों के नारों ने सत्ता की नींव को झकझोर दिया है। “मुल्ला लीव ईरान”, “तानाशाही नहीं चलेगी” और सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई के खिलाफ सीधे नारे अब खुलेआम लगाए जा रहे हैं। यह वही ईरान है, जहां सत्ता विरोधी आवाज़ उठाना कभी अकल्पनीय माना जाता था।
इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी है जेन-ज़ेड पीढ़ी। सोशल मीडिया के ज़रिये संगठित हो रहे युवा न सिर्फ सड़कों पर हैं, बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर भी सरकार को खुली चुनौती दे रहे हैं। तीन साल पहले हिजाब को लेकर उठी जनक्रांति को सरकार ने बल प्रयोग से दबा दिया था, लेकिन वह असंतोष खत्म नहीं हुआ। अब वही गुस्सा नए रूप में, कहीं अधिक संगठित और व्यापक होकर सामने आया है।
सरकार ने विरोध को कुचलने के लिए सख्त कदम उठाए हैं। कई शहरों में प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया, विश्वविद्यालयों में छापेमारी हुई और कुछ स्थानों पर आंसू गैस व लाइव फायरिंग की खबरें सामने आई हैं। तेहरान में एक छात्र के गंभीर रूप से घायल होने की सूचना ने माहौल को और तनावपूर्ण बना दिया है। हालात की गंभीरता को देखते हुए सरकार ने कम से कम 17 प्रांतों में स्कूल और सरकारी दफ्तर बंद करने का फैसला किया है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ईरान की स्थिति पर नजरें टिकी हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की ओर से ईरान पर संभावित हमले की धमकी ने पहले से उबाल पर खड़े हालात को और भड़का दिया है। वहीं अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने ईरान के विभिन्न शहरों में फैलते विरोध प्रदर्शनों का हवाला देते हुए ईरानी जनता के साहस की सराहना की है और आर्थिक कुप्रबंधन को असंतोष की जड़ बताया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह आंदोलन केवल आर्थिक संकट की प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि यह धार्मिक तानाशाही से मुक्ति की व्यापक मांग का संकेत देता है। 46 साल पहले जिस व्यवस्था ने सत्ता संभाली थी, आज वही व्यवस्था जनता के आक्रोश के घेरे में है।
फिलहाल सवाल यह है कि क्या यह विरोध आंदोलन एक और ऐतिहासिक क्रांति की ओर बढ़ रहा है, या फिर सत्ता इसे भी बल प्रयोग से दबाने में सफल होगी। लेकिन इतना तय है कि ईरान की सड़कों पर उठ रही यह आवाज़ अब केवल विरोध नहीं, बल्कि बदलाव की घोषणा बन चुकी है।
