बारिश और बर्फबारी का अभाव: उत्तराखंड की आर्थिकी पर भारी असर, सूखे जैसे हालात से फसलें तबाह
देहरादून/चमोली/श्रीनगर।
उत्तराखंड में इस वर्ष बारिश और बर्फबारी की भारी कमी ने राज्य की आर्थिकी पर गहरा असर डालना शुरू कर दिया है। हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि कई जिलों में सूखे जैसे हालात पैदा हो गए हैं। इसका सीधा असर खेती, बागवानी, पर्यटन और जंगलों की सेहत पर पड़ रहा है।
कम बारिश और बर्फबारी के कारण पहाड़ी क्षेत्रों में पर्यटन कारोबार प्रभावित हुआ है, वहीं कृषि विभाग की रिपोर्ट के अनुसार गेहूं सहित अन्य फसलों को 15 से 25 प्रतिशत तक नुकसान हो चुका है। हालात की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 12 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित तुंगनाथ, जहां आमतौर पर दिसंबर में बर्फ की मोटी चादर जम जाती थी, इस बार जनवरी के मध्य तक पूरी तरह बर्फविहीन बना हुआ है। विशेषज्ञ इसे असामान्य और चिंताजनक मान रहे हैं।
खेती पर संकट गहराया
प्रदेश में अक्तूबर और नवंबर के दौरान गेहूं की बुवाई होती है। पर्वतीय जिलों में करीब 90 प्रतिशत कृषि भूमि असिंचित है, जो पूरी तरह बारिश पर निर्भर रहती है। बारिश न होने से फसलों का जमाव कम हुआ है और किसान आसमान की ओर टकटकी लगाए हुए हैं।
कृषि विभाग के अनुसार उत्तरकाशी जिले के भटवाड़ी और डुंडा ब्लॉक में गेहूं की 25 प्रतिशत फसल खराब हो चुकी है। चिन्यालीसौंड और पुरोला में 15 प्रतिशत, नौगांव में 20 और मोरी में 10 प्रतिशत नुकसान हुआ है। देहरादून जिले के चकराता और कालसी क्षेत्रों में गेहूं और मटर की फसल को 15 से 20 प्रतिशत तक क्षति पहुंची है।
इसके अलावा चमोली में 10 से 15, अल्मोड़ा में पांच से 10, टिहरी में 15 से 20, नैनीताल में पांच से 15, रुद्रप्रयाग में पांच से 10, चंपावत और बागेश्वर में 10 से 15 तथा पिथौरागढ़ में आठ से 10 प्रतिशत तक फसल प्रभावित हुई है। अधिकारियों का कहना है कि यदि जल्द बारिश नहीं हुई तो नुकसान और बढ़ सकता है।
जड़ी-बूटियों पर भी मंडराया खतरा
तुंगनाथ स्थित गढ़वाल विश्वविद्यालय का एल्पाइन रिसर्च सेंटर उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पाई जाने वाली दुर्लभ जड़ी-बूटियों पर शोध करता है। विशेषज्ञों के अनुसार बर्फ का अभाव इन पौधों के प्राकृतिक जीवन चक्र को प्रभावित कर रहा है।
गढ़वाल विश्वविद्यालय के भूगोलवेत्ता प्रो. मोहन पंवार बताते हैं कि जनवरी में तुंगनाथ जैसे उच्च हिमालयी क्षेत्र में बर्फ न होना न केवल असामान्य है, बल्कि जलवायु परिवर्तन का गंभीर संकेत भी है।
जड़ी-बूटी विशेषज्ञ डॉ. विजयकांत पुरोहित के अनुसार अल्पाइन क्षेत्र की औषधीय वनस्पतियां शीतकालीन बर्फ पर निर्भर रहती हैं। बर्फ तापमान संतुलन और नमी का स्थायी स्रोत होती है। इसके अभाव में जड़ी-बूटियों के अंकुरण, वृद्धि और औषधीय गुणों पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
जंगलों में आग की घटनाएं बढ़ीं
बारिश और बर्फबारी न होने से जंगलों में नमी की कमी हो गई है, जिससे आग की घटनाएं बढ़ रही हैं। वन विभाग की रिपोर्ट के अनुसार नवंबर 2025 के बाद से प्रदेश में 31 वनाग्नि की घटनाएं सामने आ चुकी हैं, जिनमें लगभग 15 हेक्टेयर जंगल क्षेत्र को नुकसान पहुंचा है। मुख्य वन संरक्षक सुशांत पटनायक का कहना है कि मौसम जंगल की आग को रोकने में अहम भूमिका निभाता है।
मौसम विभाग ने जताई राहत की उम्मीद
मौसम विज्ञान केंद्र देहरादून के निदेशक डॉ. सी.एस. तोमर के अनुसार पिछले पांच वर्षों में दिसंबर महीने में सामान्य बारिश केवल एक बार ही हुई है। जनवरी के दूसरे सप्ताह में पश्चिमी विक्षोभ के सक्रिय होने से बारिश और बर्फबारी की संभावना जताई जा रही है, जिससे हालात में कुछ सुधार हो सकता है।
बागवानी पर भी पड़ेगा असर
विशेषज्ञों के अनुसार सेब की फसल के लिए 1000 से 1500 घंटे की शीतलन अवधि आवश्यक होती है। बारिश और बर्फबारी न होने से सेब समेत अन्य बागवानी फसलों की उत्पादकता पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका है।
कुल मिलाकर, यदि जल्द मौसम ने करवट नहीं ली तो उत्तराखंड को खेती, बागवानी, जैव विविधता और वन संरक्षण के मोर्चे पर भारी नुकसान झेलना पड़ सकता है।
