(सलीम रज़ा, पत्रकार)
8 मार्च का दिन हर वर्ष जब आता है तो दुनिया भर में महिला दिवस के नाम पर कार्यक्रम होते हैं, भाषण दिए जाते हैं, सम्मान समारोह आयोजित किए जाते हैं और महिलाओं की उपलब्धियों की चर्चा की जाती है। मंचों पर तालियाँ बजती हैं, सोशल मीडिया पर संदेश लिखे जाते हैं और पोस्टरों में सशक्त महिला की तस्वीरें दिखाई देती हैं। लेकिन इन सबके बीच एक सवाल अक्सर मन में उठता है—क्या सचमुच महिलाओं की स्थिति उतनी ही मजबूत और सम्मानजनक हो चुकी है, जितनी तस्वीरें हमें दिखाई जाती हैं? या फिर यह दिन हमें उस सच्चाई से रूबरू कराता है जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं।
समाज की आधी आबादी कही जाने वाली महिला आज भी कई तरह की चुनौतियों और संघर्षों से गुजर रही है। यह सच है कि समय बदला है, अवसर बढ़े हैं और महिलाएँ जीवन के लगभग हर क्षेत्र में आगे आई हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि इन उपलब्धियों के पीछे संघर्षों की लंबी और दर्दभरी कहानी छिपी हुई है। यह कहानी केवल अधिकारों की नहीं, बल्कि सम्मान, सुरक्षा और पहचान की भी है।
यदि हम इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें तो पाएंगे कि महिला हमेशा से समाज की आधारशिला रही है। वह जन्म देती है, पालन करती है, संस्कार देती है और परिवार को एक सूत्र में बांधकर रखती है। लेकिन विडंबना यह रही कि जिस महिला ने समाज को जीवन दिया, उसी समाज ने कई बार उसके अस्तित्व को ही सीमाओं में बांध दिया। सदियों तक महिलाओं को केवल घर की चारदीवारी तक सीमित रखा गया। उनकी शिक्षा, स्वतंत्रता और निर्णय लेने के अधिकार पर प्रतिबंध लगाए गए। उन्हें यह समझाया गया कि उनका संसार केवल परिवार तक ही सीमित है।
समय बदला, समाज बदला और महिलाओं ने भी अपने अधिकारों के लिए आवाज उठानी शुरू की। शिक्षा का प्रसार हुआ और महिलाओं ने यह समझना शुरू किया कि वे केवल किसी की बेटी, बहन या पत्नी ही नहीं, बल्कि अपनी अलग पहचान रखने वाली स्वतंत्र व्यक्तित्व भी हैं। यही वह दौर था जब महिलाओं ने सामाजिक बंधनों को चुनौती देना शुरू किया और धीरे-धीरे समाज में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई।
आज महिलाएँ अंतरिक्ष से लेकर राजनीति तक, विज्ञान से लेकर खेल तक और साहित्य से लेकर प्रशासन तक हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का परिचय दे रही हैं। वे देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। कई महिलाएँ अपने साहस और मेहनत से ऐसी ऊंचाइयों तक पहुँची हैं जो कभी केवल पुरुषों के लिए ही मानी जाती थीं। यह परिवर्तन निश्चित रूप से गर्व का विषय है।
लेकिन इस उजली तस्वीर के पीछे एक स्याह सच्चाई भी मौजूद है। आज भी देश और दुनिया के कई हिस्सों में महिलाएँ हिंसा, भेदभाव और असमानता का सामना कर रही हैं। कई घरों में बेटियों के जन्म पर आज भी खुशियाँ नहीं मनाई जातीं। आज भी कुछ परिवारों में बेटियों की पढ़ाई को अनावश्यक समझा जाता है। बाल विवाह, दहेज प्रथा और घरेलू हिंसा जैसी समस्याएँ आज भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं।
एक लड़की का जीवन अक्सर जन्म से ही संघर्षों के साथ शुरू हो जाता है। कई जगहों पर उसे यह महसूस कराया जाता है कि वह परिवार पर बोझ है। बचपन से ही उसे यह सिखाया जाता है कि उसे सीमाओं में रहकर जीना है, अपनी इच्छाओं को दबाकर रखना है और दूसरों की अपेक्षाओं के अनुसार खुद को ढालना है। जब वह बड़ी होती है तो समाज की नजरें उसके हर कदम पर होती हैं—कैसे कपड़े पहने, कैसे बोले, कहाँ जाए और किससे मिले।
एक तरफ समाज महिला को देवी का रूप मानता है, उसकी पूजा करता है, लेकिन दूसरी तरफ उसी महिला को कई बार अपमान, उत्पीड़न और असुरक्षा का सामना करना पड़ता है। यह विरोधाभास हमारे समाज की एक बड़ी सच्चाई है। हम शब्दों में महिलाओं को सम्मान देते हैं, लेकिन व्यवहार में अक्सर वही सम्मान दिखाई नहीं देता।
महिला दिवस के अवसर पर जब हम महिलाओं की उपलब्धियों की चर्चा करते हैं तो यह भी जरूरी है कि हम उन अनगिनत महिलाओं को याद करें जिनकी मेहनत और त्याग अक्सर दिखाई नहीं देते। वह महिला जो सुबह से रात तक घर की जिम्मेदारियों में लगी रहती है, परिवार के हर सदस्य की जरूरतों का ख्याल रखती है, लेकिन उसके काम को कभी “काम” नहीं माना जाता। उसकी थकान, उसकी इच्छाएँ और उसके सपने अक्सर परिवार की जिम्मेदारियों के पीछे कहीं खो जाते हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की स्थिति कई बार और भी चुनौतीपूर्ण होती है। खेतों में काम करने से लेकर घर संभालने तक वे लगातार मेहनत करती हैं, लेकिन आर्थिक और सामाजिक निर्णयों में उनकी भागीदारी सीमित रहती है। कई बार उन्हें अपने अधिकारों और सरकारी योजनाओं की जानकारी तक नहीं होती। शिक्षा और स्वास्थ्य की कमी भी उनके विकास में बड़ी बाधा बनती है।
शहरों में भी महिलाओं की चुनौतियाँ अलग रूप में सामने आती हैं। यहाँ महिलाएँ पढ़-लिखकर नौकरी कर रही हैं, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन रही हैं, लेकिन कार्यस्थल पर लैंगिक भेदभाव, असमान वेतन और सुरक्षा की चिंता जैसी समस्याएँ अब भी मौजूद हैं। कई महिलाएँ घर और नौकरी दोनों की जिम्मेदारियों को निभाते हुए मानसिक और शारीरिक दबाव का सामना करती हैं।
इन सबके बीच सबसे भावुक करने वाली बात यह है कि कई महिलाएँ अपने सपनों को पूरा करने से पहले ही उन्हें त्याग देती हैं। वे अपने परिवार की खुशियों को अपनी खुशियों से ऊपर रखती हैं। माँ के रूप में वह अपने बच्चों के लिए हर संघर्ष सह लेती है। बेटी के रूप में वह परिवार की उम्मीदों को पूरा करने की कोशिश करती है। पत्नी के रूप में वह अपने साथी का साथ निभाने के लिए खुद को कई बार पीछे रख देती है।
महिला की यह त्याग और संवेदनशीलता ही समाज की सबसे बड़ी ताकत है। लेकिन यह भी जरूरी है कि समाज इस त्याग को केवल कर्तव्य समझकर नजरअंदाज न करे, बल्कि उसे सम्मान और सहयोग भी दे। महिला को केवल सहनशीलता की प्रतीक मानना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे अपने जीवन के फैसले लेने की स्वतंत्रता भी मिलनी चाहिए।
महिला सशक्तिकरण का वास्तविक अर्थ तभी पूरा होगा जब समाज की सोच में बदलाव आएगा। जब बेटी और बेटे के बीच कोई भेदभाव नहीं रहेगा। जब परिवार में लड़कियों को भी अपने सपने देखने और उन्हें पूरा करने का अवसर मिलेगा। जब महिलाओं की सुरक्षा केवल कानूनों तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि सामाजिक व्यवहार में भी दिखाई देगी।
आज कई सकारात्मक परिवर्तन भी देखने को मिल रहे हैं। शिक्षा के प्रसार, जागरूकता और कानूनों के कारण महिलाओं की स्थिति पहले की तुलना में बेहतर हुई है। महिलाएँ अपने अधिकारों के प्रति अधिक जागरूक हो रही हैं और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का साहस भी दिखा रही हैं। समाज में भी धीरे-धीरे यह समझ विकसित हो रही है कि महिलाओं के बिना किसी भी राष्ट्र का विकास अधूरा है।
महिला दिवस हमें केवल उत्सव मनाने का अवसर नहीं देता, बल्कि यह हमें यह सोचने के लिए भी प्रेरित करता है कि हम अपने समाज को कितना संवेदनशील और समानतापूर्ण बना पाए हैं। यह दिन हमें याद दिलाता है कि महिला केवल परिवार की जिम्मेदारियों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह समाज और राष्ट्र के निर्माण की एक महत्वपूर्ण शक्ति है।
जब एक महिला शिक्षित होती है तो केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि पूरा परिवार और आने वाली पीढ़ियाँ शिक्षित होती हैं। जब एक महिला आत्मनिर्भर बनती है तो वह अपने साथ कई अन्य महिलाओं को भी आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। इसलिए महिलाओं को शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और अवसर प्रदान करना केवल सामाजिक न्याय का सवाल नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र के विकास की भी आवश्यकता है।
आज की महिला पहले से अधिक आत्मविश्वासी और जागरूक है। वह अपने अधिकारों के लिए खड़ी होना जानती है और अपने सपनों को पूरा करने का साहस भी रखती है। लेकिन इस यात्रा में समाज का सहयोग भी उतना ही जरूरी है। यदि परिवार, समाज और सरकार मिलकर महिलाओं के लिए समान अवसर और सुरक्षित वातावरण तैयार करें, तो वह दिन दूर नहीं जब महिला दिवस केवल संघर्षों की याद दिलाने वाला दिन नहीं रहेगा, बल्कि वास्तविक समानता और सम्मान का उत्सव बन जाएगा।
महिला दिवस का असली अर्थ तभी पूरा होगा जब किसी बेटी के जन्म पर पूरे घर में उतनी ही खुशियाँ मनाई जाएँ जितनी बेटे के जन्म पर होती हैं। जब किसी लड़की को अपने सपनों को पूरा करने के लिए समाज की अनुमति की जरूरत न पड़े। जब किसी महिला को अपने सम्मान और सुरक्षा के लिए डर के साए में जीना न पड़े।
एक संवेदनशील और समान समाज की कल्पना तभी साकार हो सकती है जब हम यह स्वीकार करें कि महिला केवल समाज की आधी आबादी नहीं, बल्कि उसकी आत्मा है। उसके बिना परिवार अधूरा है, समाज अधूरा है और विकास की कहानी भी अधूरी है।
इसलिए महिला दिवस केवल एक दिन नहीं, बल्कि एक संकल्प है—एक ऐसे समाज के निर्माण का संकल्प जहाँ हर महिला को सम्मान, सुरक्षा और समान अवसर मिले। जहाँ उसकी पहचान केवल रिश्तों से नहीं, बल्कि उसकी अपनी क्षमता, प्रतिभा और व्यक्तित्व से हो। और शायद उस दिन महिला दिवस के मंचों पर दिए जाने वाले भाषणों से अधिक महत्वपूर्ण होगा समाज का वह व्यवहार, जिसमें हर महिला को सचमुच बराबरी और सम्मान के साथ जीने का अधिकार मिल चुका होगा।

