ज़ीशान सिद्दीकी सैदपुर
तरकश से निकला ये तीर सीधे हालात के दिल पर जाकर लगता है—और मज़े की बात ये है कि दिल है भी या नहीं, इस पर भी बहस जारी है। ऊपर से घोषणा होती है कि “किसी चीज़ की कोई कमी नहीं है”, और नीचे जनता ऐसे लाइन में खड़ी है जैसे मुफ़्त में इतिहास बाँटा जा रहा हो। अब समझ नहीं आता कि कमी गैस, पेट्रोल और डीज़ल की है, या सच्चाई की।
गैस एजेंसियों के बाहर लगी लंबी कतारें किसी धार्मिक यात्रा का दृश्य नहीं हैं, लेकिन श्रद्धा उतनी ही दिखाई देती है—हर व्यक्ति के चेहरे पर सिलेंडर दर्शन की आस। पेट्रोल पंपों पर गाड़ियों की लाइनें इतनी लंबी कि लगता है जैसे लोग पेट्रोल नहीं, उम्मीद भरवा रहे हों। और सरकार का भरोसा ऐसा कि “सब ठीक है”—मानो ये लाइनें जनता की फिटनेस ड्रिल का हिस्सा हों।
शहरों में होटल धीरे-धीरे ऐसे बंद हो रहे हैं जैसे कोई पुरानी किताब अलमारी में सरका दी जाती है। चूल्हे पर लौटती सभ्यता देखकर लगता है कि हम विकास नहीं, पुनः प्रसारण कर रहे हैं। भैंस, गाय के उपले और लकड़ी की बढ़ती बिक्री ने तो जैसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नया स्टार्टअप बना दिया है—“Back to Basics Pvt. Ltd.”
भट्टियों पर काम करते कारीगरों को देखकर लगता है कि इंडस्ट्री 4.0 का सपना फिलहाल चूल्हा 1.0 पर अटका हुआ है। गैस बुकिंग एक ऐसी परीक्षा बन गई है जिसमें स्लॉट मिलना ही सबसे बड़ी सफलता है। और बड़े शहरों में सिलेंडर 2500 पार कर गया है—अब ये खाना बनाने का साधन कम, स्टेटस सिंबल ज़्यादा लगता है।
बिजली वाले इंडक्शन की मांग अचानक बढ़ गई है, जैसे लोगों ने गैस से ब्रेकअप करके नया रिश्ता शुरू कर लिया हो। शादी-विवाह के फंक्शन में गैस की दिक्कत ने मेहमानों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है कि “खाना मिलेगा या सिर्फ़ आशीर्वाद?”
सरकार ने 10 किलो सिलेंडर देने का ऐलान किया है—जैसे किसी भूखे को पूरा भोजन नहीं, स्नैक्स का वादा किया जा रहा हो। और फिर भी दावा यही कि कोई कमी नहीं है।
अब सवाल ये नहीं रह गया कि कमी है या नहीं। सवाल ये है कि जो दिख रहा है, वो असलियत है या हमारी आँखों का कोई सामूहिक भ्रम। अगर ये सब जनता का षड्यंत्र है, तो वाकई जनता बहुत संगठित हो गई है—इतनी कि हर शहर, हर गली में एक जैसा “नाटक” कर रही है।
और अगर सरकार को ये सब दिखाई नहीं दे रहा, तो शायद चश्मा बदलने का समय आ गया है—क्योंकि जनता की नज़र में तो सब कुछ साफ़-साफ़ दिख रहा है।

