कोटद्वार (पौड़ी) : उत्तराखंड स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत एक डॉक्टर दंपति ने अपनी तैनाती, स्थानांतरण नीति एवं सेवा संबंधी लाभों को लेकर शासन के समक्ष गंभीर आपत्ति दर्ज कराई है। इस संबंध में उन्होंने महा निदेशक, चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण को एक विस्तृत प्रत्यावेदन सौंपते हुए न्यायोचित कार्रवाई की मांग की है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, संबंधित चिकित्सक ने पीजी (एमएस ऑर्थोपेडिक) पूर्ण करने के उपरांत शासनादेश संख्या 379892 दिनांक 17 मार्च 2026 के तहत उप जिला चिकित्सालय, कोटद्वार (पौड़ी) में तैनाती प्राप्त की। जबकि उन्होंने 01 जनवरी 2026 को ही दुर्गम क्षेत्र में तैनाती हेतु आवेदन किया था, जिस पर अब तक कोई सकारात्मक निर्णय नहीं लिया गया।चिकित्सक का कहना है कि उन्होंने विभाग से विधिवत एनओसी लेकर पीजी कोर्स पूरा किया है। उनकी पत्नी वर्तमान में जिला चिकित्सालय, पौड़ी गढ़वाल में ईएनटी विशेषज्ञ के रूप में कार्यरत हैं। ऐसे में उत्तराखंड स्थानांतरण अधिनियम, 2017 के प्रावधानों के अनुसार पति-पत्नी को एक ही स्थान पर तैनाती का लाभ मिलना चाहिए था, जो उन्हें नहीं दिया गया।
गौरतलब है कि जिला चिकित्सालय, पौड़ी में आर्थोपेडिक विशेषज्ञ का पद वर्तमान में रिक्त है। इसके बावजूद संबंधित चिकित्सक की तैनाती वहां न कर उप जिला चिकित्सालय, कोटद्वार में की गई है, जिससे तैनाती प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं।
इसके अतिरिक्त, उपलब्ध जानकारी के अनुसार एनएचएम के अंतर्गत “यू-कोड वी पे” योजना के तहत एक आर्थोपेडिक चिकित्सक जिला चिकित्सालय पौड़ी में तथा दो चिकित्सक उप जिला चिकित्सालय कोटद्वार में पूर्व से कार्यरत हैं। वहीं, इन संविदा चिकित्सकों को 3-4 लाख रुपये प्रति माह तक का मानदेय दिया जा रहा है, जबकि नियमित चिकित्सकों को अपेक्षित लाभ एवं प्राथमिकता नहीं मिल पा रही है।डॉक्टर दंपति ने यह भी उल्लेख किया है कि वे स्वयं 5-6 वर्षों तक दुर्गम क्षेत्र—जिला चिकित्सालय पौड़ी—में सेवाएं देने के इच्छुक हैं, बावजूद इसके उनकी मांगों की अनदेखी की जा रही है। उन्होंने आरोप लगाया है कि उन्हें दुर्गम क्षेत्र में तैनाती के बावजूद मिलने वाले 50% अतिरिक्त वेतन (इंसेंटिव) से भी वंचित रखा गया है, जिससे उनके भविष्य के वेतन एवं अन्य लाभों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
दंपति ने अलग-अलग स्थानों पर तैनाती के कारण उत्पन्न मानसिक एवं पारिवारिक कठिनाइयों का भी उल्लेख करते हुए कहा कि इसका असर उनके कार्य प्रदर्शन पर पड़ रहा है। उन्होंने आर्थिक एवं मानसिक प्रताड़ना का हवाला देते हुए बांड की शर्तों में शिथिलता प्रदान कर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) की अनुमति देने की भी मांग की है।
प्रत्यावेदन में शासन से तीन विकल्पों में से किसी एक पर शीघ्र निर्णय लेने का अनुरोध किया गया है—
1- आर्थोपेडिक चिकित्सक को दुर्गम क्षेत्र पौड़ी में पत्नी के साथ तैनाती देकर सभी संबंधित लाभ प्रदान किए जाएं।
2- वर्तमान तैनाती को यथावत रखते हुए दुर्गम क्षेत्र में मिलने वाले समस्त वित्तीय लाभ दिए जाएं।
3- उनकी पत्नी का स्थानांतरण कोटद्वार में ईएनटी विशेषज्ञ के रिक्त पद पर कर दोनों को एक ही स्थान पर तैनात किया जाए।
अंत में, डॉक्टर दंपति ने चेतावनी दी है कि यदि 30 दिनों के भीतर उनकी मांगों पर संतोषजनक निर्णय नहीं लिया गया, तो वे न्यायालय की शरण लेने को बाध्य होंगे।
अंत में, डॉक्टर दंपति ने चेतावनी दी है कि यदि 30 दिनों के भीतर उनकी मांगों पर संतोषजनक निर्णय नहीं लिया गया, तो वे न्यायालय की शरण लेने को बाध्य होंगे।
यह प्रकरण न केवल एक दंपति की व्यक्तिगत समस्या को दर्शाता है, बल्कि राज्य की स्थानांतरण नीति, सेवा न्याय एवं दुर्गम क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की वास्तविक स्थिति को भी उजागर करता है। अब देखना होगा कि शासन इस विषय में क्या निर्णय लेता है।
