देहरादून: उत्तराखंड में जन शिकायतों के निस्तारण को लेकर एक गंभीर मामला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सीएम हेल्पलाइन 1905 की समीक्षा के दौरान यह तथ्य सामने आया कि हजारों शिकायतों को बिना उचित समाधान के ही बंद कर दिया गया। जब यह जानकारी मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के सामने रखी गई, तो उन्होंने इस पर कड़ी नाराजगी जताई और स्पष्ट निर्देश दिए कि इस प्रकार की लापरवाही बिल्कुल बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
मुख्यमंत्री ने दो टूक कहा कि किसी भी शिकायत को जबरन बंद करने का अधिकार किसी भी अधिकारी को नहीं है, जब तक कि उसे जिलाधिकारी, विभागाध्यक्ष या संबंधित सचिव की मंजूरी प्राप्त न हो। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि हेल्पलाइन महज एक फोन नंबर नहीं है, बल्कि यह जनता के विश्वास और उम्मीदों का प्रतीक है। इसलिए हर शिकायत का निस्तारण तभी माना जाए जब शिकायतकर्ता पूरी तरह संतुष्ट हो।
समीक्षा के दौरान विभिन्न जिलों से जुड़े आंकड़े भी सामने आए, जिनसे स्पष्ट हुआ कि कई विभागों में समस्याएं लगातार बनी हुई हैं। देहरादून में शहरी विकास और पेयजल से संबंधित शिकायतें सबसे अधिक हैं, जबकि ऊधम सिंह नगर में राजस्व और खनन विभाग से जुड़ी शिकायतें प्रमुख रूप से सामने आई हैं। हरिद्वार में खाद्य आपूर्ति और पुलिस विभाग के खिलाफ सबसे ज्यादा शिकायतें दर्ज की गई हैं। मुख्यमंत्री ने निर्देश दिए कि इन शिकायतों की नियमित और गंभीर समीक्षा की जाए—जिलाधिकारी स्तर पर हर सप्ताह और सचिव स्तर पर हर महीने कम से कम दो बार।
हालांकि कुछ अधिकारियों ने बेहतर प्रदर्शन भी किया है, जिनकी मुख्यमंत्री ने सराहना की। इन अधिकारियों ने बड़ी संख्या में शिकायतों का समाधान किया और उच्च प्रतिशत में निस्तारण सुनिश्चित किया। मुख्यमंत्री ने स्वयं उनसे बातचीत कर उनके प्रयासों की प्रशंसा की और इसे अन्य अधिकारियों के लिए उदाहरण बताया।
दूसरी ओर, कई विभागों में गंभीर लापरवाही भी सामने आई। कुल 1,19,077 शिकायतों में से 22,246 शिकायतें बिना उचित कारण के बंद कर दी गईं, जो लगभग 18.68 प्रतिशत है। आरोप है कि कई विभाग अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए शिकायतों की श्रेणी ही बदल दे रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, पानी की आपूर्ति न होने की शिकायतों को नजरअंदाज कर दिया गया, जबकि गैस सिलिंडर रिफिल और राशन कार्ड जैसी समस्याओं को शिकायत मानने के बजाय सिर्फ ‘डिमांड’ बताकर छोड़ दिया गया। बिजली बिल और खराब मीटर जैसी समस्याओं को भी तकनीकी उलझनों में डालकर टालने की कोशिश की गई।
जल संस्थान का मामला सबसे चिंताजनक रहा, जहां पेयजल से जुड़ी 2,074 शिकायतों में से 2,043 को बिना ठोस समाधान के बंद कर दिया गया। इसी तरह, पर्यटन विभाग में भी शिकायतों के निस्तारण की स्थिति बेहद कमजोर पाई गई, जहां अधिकांश शिकायतें लंबित ही रहीं।
लंबित शिकायतों की स्थिति भी बेहद गंभीर है। वर्ष 2021 से अब तक 6,287 शिकायतें ऐसी हैं, जो 180 दिनों से अधिक समय से लंबित हैं। इनमें राजस्व, वन और लोक निर्माण विभाग सबसे आगे हैं। कई शिकायतें वर्षों से प्रक्रिया में ही अटकी हुई हैं, जिससे लोगों में असंतोष बढ़ रहा है।
आंकड़ों से यह भी पता चला कि हाल के महीनों में स्थिति और बिगड़ी है। अक्टूबर से दिसंबर 2025 की तुलना में जनवरी से मार्च 2026 के बीच लंबित शिकायतों में 107 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जबकि प्रक्रिया में चल रही शिकायतों में 2290 प्रतिशत का भारी उछाल आया है। यह दर्शाता है कि समस्या का समाधान होने के बजाय वह और जटिल होती जा रही है।
मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि यदि कोई अधिकारी जानबूझकर शिकायतों को दबाने या बंद करने की कोशिश करता है, तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि प्रशासन की असली सफलता तभी मानी जाएगी, जब आम जनता को यह महसूस हो कि उनकी समस्याओं को गंभीरता से लिया जा रहा है और उनका समयबद्ध समाधान किया जा रहा है।
