जोधपुर : कायस्थ समाज की प्रतिभाओं ने मदर्स डे से एक दिन पूर्व मां के प्रति अपनी श्रद्धा, सम्मान और भावनाओं को अनूठे अंदाज में व्यक्त करते हुए मां पर आधारित अपनी-अपनी पेंटिंग्स जारी कीं। इन चित्रों में मां के वात्सल्य, त्याग, ममता और संघर्षपूर्ण जीवन को बेहद प्रभावशाली ढंग से दर्शाया गया, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। प्रदर्शित पेंटिंग्स को दर्शकों ने मुक्त कंठ से सराहा और कलाकारों के भावनात्मक प्रयास की प्रशंसा की। कार्यक्रम के दौरान पूरे वातावरण में मातृत्व के प्रति सम्मान और संवेदनाओं का भाव स्पष्ट रूप से दिखाई दिया।
इंजीनियर अंशुल माथुर ने इस अवसर पर कहा कि मां ईश्वर का स्वरूप होती है और उसकी तुलना संसार में किसी से भी नहीं की जा सकती। मां का स्थान सबसे ऊंचा और सर्वोपरि होता है क्योंकि वही अपने बच्चों को बिना किसी स्वार्थ के प्रेम, संस्कार और जीवन जीने की प्रेरणा देती है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में लोग केवल औपचारिकता के रूप में एक दिन मदर्स डे मनाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी समझ लेते हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि मां का सम्मान और सेवा जीवन के हर दिन होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि मां के त्याग और समर्पण का ऋण कोई भी संतान कभी नहीं चुका सकती।
डॉ. आरूषि माथुर ने कहा कि मां बच्चों की पहली शिक्षिका होती है। बच्चे जीवन का पहला पाठ मां की गोद में ही सीखते हैं। मां ही बच्चों को अच्छे संस्कार, अनुशासन, संवेदनशीलता और मानवीय मूल्यों की शिक्षा देती है। उन्होंने कहा कि ईश्वर हर जगह उपस्थित नहीं रह सकता, इसलिए उसने अपने प्रतिनिधि के रूप में मां को इस धरती पर भेजा है। मां परिवार को एक सूत्र में बांधकर रखने का कार्य करती है और उसके कारण ही घर में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है।
आयुष्मान माथुर ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि आधुनिक जीवनशैली और भागदौड़ भरे समय में लोगों के पास परिवार के लिए समय कम होता जा रहा है, लेकिन मां हमेशा अपने बच्चों और परिवार के लिए समर्पित रहती है। मां का प्रेम निस्वार्थ होता है और वह हर परिस्थिति में अपने परिवार का संबल बनकर खड़ी रहती है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे अपने माता-पिता, विशेषकर मां के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता बनाए रखें तथा उनके त्याग को समझने का प्रयास करें।
गरिमा माथुर ने कहा कि मां ममता की सजीव प्रतिमा होती है। उसका त्यागमय जीवन सदैव वंदनीय और प्रेरणादायी रहता है। मां कभी अपने लिए नहीं जीती, बल्कि पूरे परिवार की खुशियों में ही अपनी खुशी तलाशती है। उन्होंने कहा कि मां कोई साधारण स्त्री नहीं होती, बल्कि वह देवतुल्य होती है। उसके भीतर सहनशीलता, प्रेम, करुणा, धैर्य और संस्कारों का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में मां को सर्वोच्च सम्मान दिया गया है।
कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने भी मां के महत्व पर अपने विचार साझा किए और कहा कि समाज में पारिवारिक मूल्यों को मजबूत बनाए रखने में मां की सबसे बड़ी भूमिका होती है। कई प्रतिभागियों ने अपनी पेंटिंग्स के माध्यम से मां के संघर्ष, उसके स्नेह और परिवार के प्रति उसके समर्पण को रंगों के जरिए जीवंत रूप देने का प्रयास किया। कार्यक्रम के अंत में सभी ने यह संकल्प लिया कि वे केवल एक दिन नहीं बल्कि जीवनभर अपनी मां का सम्मान करेंगे और उनके प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन पूरी निष्ठा से करेंगे।
