( सलीम रज़ा पत्रकार )
पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस से नेताओं और जनप्रतिनिधियों के पार्टी छोड़ने की घटनाएं राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई हैं। हर बार जब किसी बड़े नेता या सांसद के दल छोड़ने की खबर सामने आती है, तो यह सवाल उठने लगता है कि क्या यह केवल सामान्य राजनीतिक असंतोष का परिणाम है या फिर पार्टी के भीतर किसी गहरे संकट का संकेत है। इसी क्रम में एक बड़ा प्रश्न यह भी उभरता है कि क्या यह घटनाक्रम मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली राजनीतिक व्यवस्था में बढ़ती निरंकुशता का प्रमाण है या फिर उनके लंबे राजनीतिक सफर के अंतिम अध्याय की शुरुआत।
भारतीय राजनीति में दल-बदल कोई नई घटना नहीं है। सत्ता के समीकरण बदलते ही नेताओं का एक दल से दूसरे दल में जाना अक्सर देखा जाता रहा है। लेकिन जब किसी पार्टी से लगातार प्रभावशाली चेहरे दूरी बनाने लगें, तब यह केवल व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का विषय नहीं रह जाता, बल्कि संगठन की आंतरिक स्थिति पर भी सवाल खड़े होने लगते हैं। तृणमूल कांग्रेस के मामले में भी यही स्थिति दिखाई देती है। पार्टी के कुछ नेताओं और सांसदों ने समय-समय पर नेतृत्व शैली, संगठनात्मक कार्यप्रणाली और निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर असंतोष जाहिर किया है। इससे विपक्ष को यह आरोप लगाने का अवसर मिला है कि पार्टी में लोकतांत्रिक संवाद की जगह शीर्ष नेतृत्व का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है।
ममता बनर्जी का राजनीतिक जीवन संघर्ष, जनआंदोलन और जमीनी राजनीति की मिसाल रहा है। उन्होंने उस समय पश्चिम बंगाल की राजनीति में अपनी पहचान बनाई, जब वाम मोर्चा का प्रभुत्व लगभग अटूट माना जाता था। कांग्रेस से अलग होकर उन्होंने तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की और वर्षों के संघर्ष के बाद 2011 में वामपंथी शासन को सत्ता से बाहर कर इतिहास रच दिया। यह जीत केवल राजनीतिक परिवर्तन नहीं थी, बल्कि बंगाल की जनता की उस आकांक्षा का परिणाम थी, जो लंबे समय से सत्ता परिवर्तन चाहती थी। ऐसे में ममता बनर्जी की राजनीतिक ताकत केवल संगठन या पद से नहीं, बल्कि उनकी व्यक्तिगत जनस्वीकार्यता और संघर्षशील छवि से भी जुड़ी रही है।
हालांकि सत्ता में लंबे समय तक बने रहने वाली लगभग हर पार्टी को एक समान चुनौती का सामना करना पड़ता है। समय के साथ संगठन में नए और पुराने नेताओं के बीच दूरी बढ़ती है, निर्णय लेने की प्रक्रिया कुछ चुनिंदा लोगों तक सीमित हो जाती है और असंतोष की आवाजें मुखर होने लगती हैं। तृणमूल कांग्रेस भी इससे अछूती नहीं रही है। कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी का अत्यधिक केंद्रीकरण और नेतृत्व पर बढ़ती निर्भरता भविष्य में संगठनात्मक चुनौतियां पैदा कर सकती है। यदि किसी दल में नेताओं को अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर नहीं मिलता, तो असंतोष अंततः दल-बदल या बगावत के रूप में सामने आ सकता है।
लेकिन दूसरी तरफ यह भी सच है कि किसी पार्टी से कुछ नेताओं के जाने मात्र से उसके राजनीतिक भविष्य का निर्धारण नहीं किया जा सकता। भारतीय राजनीति में ऐसे अनेक उदाहरण मौजूद हैं, जहां बड़े नेताओं के पार्टी छोड़ने के बावजूद संगठन मजबूत बना रहा और चुनावों में सफल भी हुआ। राजनीति में अंतिम फैसला जनता करती है, न कि केवल राजनीतिक समीकरण। यदि जनता का विश्वास नेतृत्व के साथ बना रहता है, तो आंतरिक असंतोष का असर सीमित हो सकता है।
ममता बनर्जी के मामले में भी यही स्थिति दिखाई देती है। तमाम विवादों, आलोचनाओं और विपक्षी हमलों के बावजूद उन्होंने लगातार चुनावी सफलता हासिल की है। 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा ने पूरी ताकत झोंक दी थी और चुनाव को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था, लेकिन इसके बावजूद तृणमूल कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की। यह परिणाम दर्शाता है कि ममता बनर्जी की व्यक्तिगत लोकप्रियता और संगठन की जमीनी पकड़ अभी भी मजबूत है। इसलिए कुछ सांसदों या नेताओं के पार्टी छोड़ने को सीधे उनके राजनीतिक पतन का संकेत मान लेना वास्तविकता से परे होगा।
फिर भी यह कहना गलत नहीं होगा कि ऐसे घटनाक्रम किसी भी राजनीतिक दल के लिए चेतावनी का काम करते हैं। यदि नेतृत्व समय रहते संगठन के भीतर उठ रहे सवालों और असंतोष को गंभीरता से नहीं लेता, तो छोटी दरारें भविष्य में बड़े संकट का रूप ले सकती हैं। लोकतांत्रिक राजनीति में संवाद, भागीदारी और संगठनात्मक संतुलन किसी भी दल की दीर्घकालिक सफलता के लिए आवश्यक होते हैं। जो दल इन मूल्यों की अनदेखी करते हैं, उन्हें अंततः राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ता है।
ममता बनर्जी के राजनीतिक भविष्य को लेकर भी फिलहाल दो तरह की तस्वीरें सामने आती हैं। एक तस्वीर उन्हें अब भी बंगाल की सबसे प्रभावशाली नेता के रूप में दिखाती है, जिनके सामने विपक्ष अभी तक कोई ऐसा चेहरा नहीं खड़ा कर पाया है जो सीधे उनकी लोकप्रियता को चुनौती दे सके। दूसरी तस्वीर यह संकेत देती है कि सत्ता में लंबे समय तक रहने के कारण संगठन के भीतर थकान, असंतोष और नेतृत्व को लेकर सवाल बढ़ रहे हैं। आने वाले वर्षों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि तृणमूल कांग्रेस इन चुनौतियों का सामना कैसे करती है।
वास्तविकता शायद इन दोनों ध्रुवों के बीच कहीं मौजूद है। सांसदों का पार्टी छोड़ना निश्चय ही एक राजनीतिक संदेश देता है और यह बताता है कि संगठन के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है। लेकिन इसे ममता बनर्जी के राजनीतिक जीवन के अंत का संकेत मान लेना भी अतिशयोक्ति होगी। राजनीति में जनाधार, नेतृत्व क्षमता, चुनावी प्रदर्शन और परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालने की क्षमता सबसे अधिक मायने रखती है। जब तक ममता बनर्जी जनता के बीच अपनी पकड़ बनाए रखने में सफल रहती हैं और पार्टी को एकजुट रखने की क्षमता दिखाती हैं, तब तक उनके राजनीतिक सफर के अंत की घोषणा करना जल्दबाजी ही माना जाएगा। हां, इतना अवश्य कहा जा सकता है कि यह दौर उनके नेतृत्व की एक महत्वपूर्ण परीक्षा है, जिसके परिणाम आने वाले वर्षों में पश्चिम बंगाल की राजनीति की दिशा तय करेंगे।

