सलीम रज़ा
देहरादून : उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों में पिछले छह वर्षों के दौरान 71,671 विद्यार्थियों की कमी का आंकड़ा केवल शिक्षा विभाग की एक सामान्य रिपोर्ट नहीं है, बल्कि यह राज्य की सरकारी शिक्षा व्यवस्था के सामने खड़े एक बड़े सवाल की ओर संकेत करता है। वर्ष 2019-20 में प्रदेश के सरकारी विद्यालयों में कक्षा एक से 12वीं तक 5,77,534 विद्यार्थी अध्ययनरत थे, जो वर्ष 2025-26 में घटकर 5,05,853 रह गए। यानी छह साल में सरकारी स्कूलों की छात्र संख्या में करीब 12 प्रतिशत की कमी आई है। इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि प्रदेश में 5,834 सरकारी विद्यालय ऐसे हैं, जहां 20 से भी कम विद्यार्थी पढ़ रहे हैं। इनमें 3,799 प्राथमिक विद्यालय और 109 माध्यमिक विद्यालय शामिल हैं।
यह स्थिति अचानक पैदा नहीं हुई है। उत्तराखंड में सरकारी स्कूलों से विद्यार्थियों के दूर होने का सिलसिला काफी लंबे समय से दिखाई देता रहा है। वर्ष 2018 से 2021 के बीच भी सरकारी स्कूलों में एक लाख से अधिक विद्यार्थियों की कमी दर्ज की गई थी। पहाड़ी जिलों में इसका असर अपेक्षाकृत ज्यादा रहा। अल्मोड़ा, पौड़ी, टिहरी, पिथौरागढ़, बागेश्वर और चमोली जैसे जिलों में पलायन, घटती आबादी और निजी स्कूलों की ओर बढ़ते रुझान ने सरकारी शिक्षा व्यवस्था की मुश्किलें बढ़ाई हैं।
ऐसे समय में यह सवाल स्वाभाविक है कि आखिर सरकारें सरकारी स्कूलों को लेकर क्या करती रही हैं और केंद्र में अलग-अलग सरकारों की शिक्षा नीतियों का उत्तराखंड पर क्या असर पड़ा। यहां एक बात साफ समझना जरूरी है कि सरकारी स्कूल केवल केंद्र सरकार के भरोसे नहीं चलते। शिक्षा के क्षेत्र में केंद्र और राज्य दोनों की जिम्मेदारी होती है। शिक्षक नियुक्ति, स्कूलों का स्थानीय प्रबंधन, कई स्तरों पर बुनियादी सुविधाएं और रोजमर्रा का संचालन राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आते हैं, जबकि केंद्र सरकार योजनाओं, वित्तीय सहायता, राष्ट्रीय नीतियों और मानकों के माध्यम से महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसलिए केवल दिल्ली की सरकार को उत्तराखंड के स्कूलों की मौजूदा स्थिति के लिए जिम्मेदार ठहराना भी पूरी तस्वीर नहीं होगी।
केंद्र में पिछली कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकारों के दौर को देखें तो सरकारी शिक्षा के क्षेत्र में सर्व शिक्षा अभियान, शिक्षा का अधिकार कानून और माध्यमिक शिक्षा के विस्तार जैसी बड़ी पहलें सामने आईं। सर्व शिक्षा अभियान वर्ष 2000-01 से लागू हुआ और उसका उद्देश्य स्कूलों तक पहुंच बढ़ाने, बच्चों को विद्यालय में बनाए रखने, शिक्षकों की व्यवस्था, भवन, शौचालय, पेयजल, किताबों और अन्य सुविधाओं को मजबूत करना था। ([Education][3]) वर्ष 2009 में शिक्षा का अधिकार कानून आया, जिसने 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य प्रारंभिक शिक्षा को कानूनी अधिकार का रूप दिया। इसी वर्ष माध्यमिक शिक्षा के विस्तार और गुणवत्ता सुधार के लिए राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान भी शुरू किया गया।
इन योजनाओं का उद्देश्य केवल स्कूलों की संख्या बढ़ाना नहीं था, बल्कि ज्यादा से ज्यादा बच्चों को स्कूल तक लाना और उन्हें स्कूल में बनाए रखना भी था। उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में इन योजनाओं की विशेष अहमियत थी, क्योंकि यहां गांव दूर-दूर बसे हैं और कई स्थानों पर एक स्कूल तक पहुंचना भी चुनौती रहा है। सरकारी विद्यालयों का सबसे बड़ा फायदा यही रहा है कि उन्होंने उन क्षेत्रों तक शिक्षा पहुंचाई जहां निजी संस्थानों के लिए स्कूल चलाना व्यावसायिक रूप से आसान नहीं था।
लेकिन दूसरी तरफ यह भी सच है कि योजनाएं बनने और बजट खर्च होने के बावजूद सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या लगातार कम होती रही। 2022 की एक रिपोर्ट में शिक्षा विभाग के आंकड़ों के आधार पर बताया गया था कि लंबे समय में प्राथमिक स्तर पर सरकारी विद्यालयों की छात्र संख्या में बड़ी गिरावट आई है और निजी स्कूलों की ओर अभिभावकों का रुझान बढ़ा है। ([Jagran][5]) इससे यह सवाल पैदा होता है कि केवल स्कूल खोलना, भवन बनाना या योजनाएं चलाना पर्याप्त नहीं है। अभिभावक अपने बच्चे को सरकारी स्कूल में क्यों भेजना चाहता है, यह सवाल उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है।
2014 के बाद केंद्र में भाजपा नेतृत्व वाली सरकार आई और शिक्षा नीति में कई नए बदलावों पर जोर दिया गया। वर्ष 2018 में सर्व शिक्षा अभियान, राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान और शिक्षक शिक्षा को मिलाकर समग्र शिक्षा योजना शुरू की गई। इसका उद्देश्य प्री-प्राइमरी से 12वीं तक स्कूल शिक्षा को एक साथ देखते हुए गुणवत्ता, समान अवसर, सीखने के परिणाम, शिक्षक प्रशिक्षण, डिजिटल शिक्षा, व्यावसायिक शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं पर काम करना है।
इसके बाद वर्ष 2020 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति आई। इसमें बच्चों की प्रारंभिक पढ़ाई, पढ़ने-लिखने और गणित की बुनियादी क्षमता, कौशल शिक्षा, स्थानीय भाषा, शिक्षक प्रशिक्षण और शिक्षा को ज्यादा व्यावहारिक बनाने पर जोर दिया गया। नीति में यह लक्ष्य रखा गया कि प्राथमिक स्तर पर हर बच्चे को बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मक ज्ञान हासिल हो। ([Education][7]) इसके लिए निपुण भारत जैसी पहल शुरू की गई।
भाजपा सरकार के दौर में डिजिटल शिक्षा, दीक्षा प्लेटफॉर्म, नई शिक्षा नीति, कौशल और व्यावसायिक शिक्षा जैसे विषयों को पहले की तुलना में ज्यादा प्रमुखता मिली। सरकार के अनुसार 2022 से 2024 के बीच बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मक क्षमता के परिणामों में सुधार हुआ है और सरकारी स्कूलों में सुधार की गति निजी स्कूलों की तुलना में अधिक रही। हालांकि ये राष्ट्रीय स्तर के आंकड़े हैं और इन्हें सीधे उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों में घटती छात्र संख्या का समाधान मान लेना उचित नहीं होगा। ([Education][9])
यहीं से उत्तराखंड की तस्वीर और ज्यादा गंभीर हो जाती है। केंद्र सरकार शिक्षा में नई योजनाएं और नई नीति ला रही है, लेकिन प्रदेश में सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या घटती जा रही है। वर्ष 2025-26 के लिए केंद्र सरकार के शिक्षा मंत्रालय की उत्तराखंड संबंधी समीक्षा में भी चिंता दर्ज की गई कि राज्य में सरकारी स्कूलों में कुल नामांकन लगभग 8.7 लाख यानी 36.68 प्रतिशत है, जबकि बिना सहायता वाले निजी विद्यालयों में नामांकन लगभग 12.90 लाख यानी 54.39 प्रतिशत है। समीक्षा में केंद्र की ओर से राज्य से विद्यार्थियों के सरकारी स्कूलों से दूर जाने के मूल कारणों का गंभीर विश्लेषण करने और सुधारात्मक कदम उठाने की बात कही गई।
इस आंकड़े को केवल कांग्रेस बनाम भाजपा के चश्मे से देखना समस्या को छोटा कर देगा। पिछली सरकारों के समय भी सरकारी स्कूलों की कमजोरियां थीं और मौजूदा सरकार के समय भी वही समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। फर्क इतना जरूर है कि वर्तमान दौर में सरकार के पास पुरानी योजनाओं का अनुभव, समग्र शिक्षा जैसी एकीकृत योजना, नई शिक्षा नीति और डिजिटल संसाधनों का अतिरिक्त ढांचा उपलब्ध है। इसके बावजूद यदि सरकारी विद्यालयों में बच्चों की संख्या घट रही है तो केवल नई योजना घोषित करना पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
उत्तराखंड की मौजूदा स्थिति में राज्य सरकार की भूमिका इसलिए और महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि वर्ष 2017 से प्रदेश में भाजपा की सरकार रही है। ऐसे में पिछले छह वर्षों की गिरती छात्र संख्या पर सवाल केवल केंद्र की नीति से नहीं, बल्कि राज्य स्तर पर स्कूलों के संचालन, शिक्षकों की उपलब्धता, स्कूलों की भौतिक स्थिति, अंग्रेजी और डिजिटल शिक्षा की मांग, अभिभावकों के भरोसे और पहाड़ों से हो रहे पलायन के संदर्भ में भी पूछे जाने चाहिए।
सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या कम होने का एक बड़ा कारण पलायन भी है। जिस गांव में पहले बड़ी संख्या में परिवार रहते थे, वहां अब परिवारों की संख्या कम हो रही है। माता-पिता रोजगार, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं और बच्चों की पढ़ाई के लिए शहरों की ओर जा रहे हैं। इसका सीधा असर गांव के स्कूल पर पड़ता है। कई जगह स्कूल में शिक्षक और भवन तो मौजूद हैं, लेकिन बच्चों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। ऐसे में केवल स्कूल की संख्या को बनाए रखना भी सरकार के लिए आर्थिक और प्रशासनिक चुनौती बन जाता है।
लेकिन पलायन को हर समस्या का एकमात्र कारण मान लेना भी उचित नहीं होगा। सरकारी स्कूलों के सामने गुणवत्ता और भरोसे का सवाल भी है। आज कई अभिभावक चाहते हैं कि उनके बच्चे अंग्रेजी बोलें, कंप्यूटर सीखें, प्रतियोगी माहौल में पढ़ें और आगे की पढ़ाई के लिए तैयार हों। निजी स्कूल इस मांग को अपने प्रचार का हिस्सा बनाते हैं। सरकारी स्कूलों में यदि यही भरोसा मजबूत नहीं होगा तो केवल मुफ्त किताब, ड्रेस, भोजन या छात्रवृत्ति देकर नामांकन लंबे समय तक नहीं बढ़ाया जा सकता।
सरकार हर वर्ष प्रवेशोत्सव जैसे अभियान चलाती है। लेकिन यदि प्रवेश के बाद बच्चे अगले वर्षों में सरकारी स्कूल छोड़ देते हैं तो केवल प्रवेशोत्सव की संख्या बढ़ाना समस्या का समाधान नहीं है। असली सवाल यह है कि बच्चा सरकारी स्कूल में दाखिला लेने के बाद वहां क्यों बना रहे। उसे बेहतर शिक्षक, नियमित पढ़ाई, अनुशासन, आधुनिक शिक्षण पद्धति, खेल, कंप्यूटर, प्रयोगशाला, पुस्तकालय और आगे की पढ़ाई के लिए बेहतर माहौल चाहिए।
सबसे चिंताजनक स्थिति उन हजारों स्कूलों की है जहां 20 से भी कम बच्चे रह गए हैं। इतने कम बच्चों वाले स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता, शिक्षक की तैनाती और संसाधनों के इस्तेमाल को लेकर सरकार को अलग रणनीति बनानी होगी। दूसरी तरफ पहाड़ी और दुर्गम क्षेत्रों में स्कूल बंद करना भी आसान समाधान नहीं है, क्योंकि इससे बच्चों को शिक्षा के लिए और दूर जाना पड़ सकता है। इसलिए सरकार के सामने चुनौती दोहरी है—जहां बच्चे कम हैं वहां स्कूल को कैसे उपयोगी बनाया जाए और जहां आबादी बढ़ रही है वहां बेहतर सरकारी शिक्षा कैसे उपलब्ध कराई जाए।
वर्ष 2024-25 में उत्तराखंड शिक्षा विभाग ने घटती छात्र संख्या के कारणों का अध्ययन करने के लिए विशेषज्ञ शिक्षकों की समिति भी बनाई थी। समिति ने अपनी रिपोर्ट विभाग को सौंपी, लेकिन हालिया रिपोर्ट के अनुसार उसके सुझावों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हो सकी। ([Jagran][1]) यही वह बिंदु है जहां सरकारी व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठते हैं। यदि समस्या की पहचान हो चुकी है, विशेषज्ञों ने सुझाव भी दे दिए हैं और फिर भी जमीन पर बदलाव नहीं दिखाई देता, तो समस्या केवल नीति की नहीं बल्कि उसे लागू करने की क्षमता और राजनीतिक-प्रशासनिक प्राथमिकता की भी हो सकती है।
पिछली केंद्र सरकारों के दौर की शिक्षा व्यवस्था में स्कूल तक पहुंच, नामांकन, अधिकार और बुनियादी ढांचे पर काफी जोर दिखाई देता है। मौजूदा भाजपा नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के दौर में शिक्षा को कौशल, तकनीक, सीखने के परिणाम और नई शिक्षा नीति से जोड़ने की कोशिश दिखाई देती है। दोनों दौर की अपनी प्राथमिकताएं और योजनाएं रही हैं। लेकिन उत्तराखंड के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन नीतियों का स्थानीय जरूरतों के हिसाब से कितना प्रभावी इस्तेमाल हुआ।
उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियां देश के मैदानी राज्यों से अलग हैं। यहां किसी योजना की सफलता केवल राष्ट्रीय स्तर के आंकड़ों से तय नहीं हो सकती। पहाड़ के एक छोटे गांव में पांच बच्चों के लिए स्कूल उतना ही महत्वपूर्ण हो सकता है जितना शहर में सैकड़ों बच्चों वाला विद्यालय। इसलिए सरकार को छात्र संख्या के साथ-साथ दूरी, पलायन, सामाजिक स्थिति और स्थानीय जरूरतों को भी ध्यान में रखना होगा।
सरकारी स्कूलों को बचाने का मतलब केवल भवन बचाना नहीं है। सरकारी स्कूलों को बचाने का अर्थ है उन परिवारों का भरोसा वापस लाना जो आज अपने बच्चों के भविष्य के लिए निजी स्कूलों की ओर देख रहे हैं। इसके लिए सरकार को यह पता करना होगा कि अभिभावक सरकारी स्कूल से क्या चाहते हैं और उन्हें सबसे ज्यादा शिकायत किस बात से है। हर जिले, हर ब्लॉक और यहां तक कि हर स्कूल की समस्या अलग हो सकती है। इसलिए एक ही फार्मूला पूरे उत्तराखंड पर लागू नहीं किया जा सकता।
इस पूरे मामले में केंद्र और राज्य सरकारों दोनों की जवाबदेही बनती है, लेकिन जिम्मेदारी की प्रकृति अलग-अलग है। केंद्र सरकार नीति, योजनाओं और वित्तीय सहयोग के माध्यम से दिशा देती है, जबकि राज्य सरकार को स्थानीय स्तर पर उसके परिणाम सुनिश्चित करने होते हैं। इसलिए उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों में छह वर्षों में 71,671 विद्यार्थियों की कमी को किसी एक राजनीतिक दल की कहानी बनाकर देखना वास्तविक समस्या से ध्यान हटाना होगा।
असल मुद्दा यह है कि आजाद भारत में सरकारी स्कूल गरीब और मध्यम वर्ग के बच्चों के लिए शिक्षा का सबसे बड़ा सहारा रहे हैं। उत्तराखंड में भी हजारों परिवारों का भविष्य इन्हीं विद्यालयों से जुड़ा है। यदि इन विद्यालयों से बच्चे लगातार बाहर जाते रहे तो इसका असर केवल शिक्षा विभाग के आंकड़ों पर नहीं पड़ेगा, बल्कि गांवों के सामाजिक ढांचे और पहाड़ी क्षेत्रों के भविष्य पर भी पड़ेगा।
सरकार को अब यह देखना होगा कि हर साल कितने बच्चों का दाखिला हुआ, यह बताने से आगे बढ़कर कितने बच्चे पांचवीं, आठवीं, दसवीं और बारहवीं तक उसी सरकारी स्कूल व्यवस्था में बने रहे। कितने बच्चों ने सीखने की वास्तविक क्षमता हासिल की। कितने स्कूलों में शिक्षक पूरे हैं। कितने स्कूलों में विज्ञान, कंप्यूटर, पुस्तकालय और खेल की सुविधाएं हैं। कितने विद्यालयों में बच्चों और अभिभावकों का भरोसा मजबूत हुआ है। और सबसे महत्वपूर्ण, जिन 5,834 सरकारी स्कूलों में 20 से कम विद्यार्थी हैं, उनके लिए सरकार की ठोस कार्ययोजना क्या है।
उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों की घटती छात्र संख्या को सरकार के खिलाफ राजनीतिक नारा बनाने के बजाय एक चेतावनी की तरह देखा जाना चाहिए। पिछली सरकारों ने कई महत्वपूर्ण शिक्षा योजनाओं की नींव रखी, वर्तमान भाजपा सरकार ने उन्हें समग्र शिक्षा और नई शिक्षा नीति के ढांचे में आगे बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन जमीन पर अंतिम कसौटी बच्चे और अभिभावक ही हैं। यदि वे सरकारी स्कूल को छोड़ रहे हैं तो सरकारों को यह समझना होगा कि योजनाओं की सफलता कागज पर नहीं, कक्षा में दिखाई देनी चाहिए।
आज जरूरत किसी एक सरकार को पूरी तरह दोषी या निर्दोष साबित करने की नहीं, बल्कि यह पूछने की है कि इतने वर्षों की योजनाओं और करोड़ों रुपये के खर्च के बाद भी उत्तराखंड के सरकारी स्कूल अभिभावकों की पहली पसंद क्यों नहीं बन पा रहे हैं। इस सवाल का ईमानदार जवाब ही आने वाले वर्षों में उत्तराखंड की सरकारी शिक्षा की दिशा तय करेगा।
