सलीम रज़ा
देहरादून : मद्रासी कॉलोनी के साथ गांधी ग्राम, ब्रह्मपुरी, लोहियानगर, महबूब कॉलोनी औरआजाद कालोनी जैसे क्षेत्रों में नशे के कारोबार को लेकर स्थानीय लोगों में लंबे समय से चिंता बनी हुई है। लोगों का कहना है कि इन इलाकों में नशीले पदार्थों की बिक्री का सिलसिला कोई नई समस्या नहीं है, बल्कि कई वर्षों से अलग-अलग रूपों में यह समस्या सामने आती रही है। नशे की उपलब्धता का सबसे गंभीर असर इलाके के युवाओं और किशोरों पर पड़ रहा है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, नशे के कारण कई परिवार परेशान हैं। कुछ परिवारों के बच्चे नशे की आदत की ओर बढ़ रहे हैं तो कई अभिभावकों को इस बात की चिंता रहती है कि कहीं उनके बच्चे भी गलत संगत में न पड़ जाएं। नशे की शुरुआत अक्सर छोटी उम्र में जिज्ञासा या दोस्तों के दबाव में होती है, लेकिन धीरे-धीरे यही आदत गंभीर समस्या का रूप ले सकती है। इसका असर पढ़ाई, रोजगार, पारिवारिक संबंधों और सामाजिक वातावरण पर भी पड़ता है।
नशे का कारोबार केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं है। यह सामाजिक और पारिवारिक समस्या भी है। जब किसी इलाके में नशीले पदार्थ आसानी से उपलब्ध होने की धारणा बनती है तो इसका सीधा प्रभाव वहां के माहौल पर पड़ता है। अभिभावक अपने बच्चों को लेकर चिंतित रहते हैं और युवाओं के भविष्य को लेकर सवाल खड़े होने लगते हैं। इसलिए इस समस्या से निपटने के लिए केवल कुछ लोगों की गिरफ्तारी पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि नशे की सप्लाई रोकने के साथ उसके कारणों पर भी काम करना जरूरी है।
उत्तराखंड सरकार की ओर से प्रदेश को नशामुक्त बनाने के लिए ‘ड्रग फ्री देवभूमि’ अभियान पर जोर दिया जा रहा है। ऐसे में देहरादून के इन क्षेत्रों में नशे के कारोबार की शिकायतें प्रशासन और पुलिस के लिए गंभीर चुनौती हैं। अभियान को धरातल पर प्रभावी बनाने के लिए उन इलाकों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है, जहां स्थानीय नागरिक लंबे समय से नशे की समस्या की शिकायत कर रहे हैं।
सबसे पहला कदम नशे की सप्लाई चेन पर प्रभावी कार्रवाई होना चाहिए। पुलिस को केवल किसी एक व्यक्ति को पकड़ने तक सीमित रहने के बजाय यह पता लगाने की कोशिश करनी चाहिए कि नशीले पदार्थ कहां से आते हैं, उन्हें कौन पहुंचाता है और इनके पीछे कौन लोग काम कर रहे हैं। इसके लिए स्थानीय स्तर पर खुफिया तंत्र को मजबूत करना जरूरी है। संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी जुटाकर नियमित निगरानी और कानूनी कार्रवाई की जाए तो नशे के कारोबार पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकता है।
इसके साथ ही संवेदनशील इलाकों में पुलिस की नियमित गश्त बढ़ाई जानी चाहिए। खासकर उन स्थानों पर निगरानी जरूरी है जहां स्थानीय लोगों को नशीले पदार्थों की बिक्री या संदिग्ध गतिविधियों की शिकायत रहती है। केवल किसी घटना के बाद कार्रवाई करने के बजाय लगातार निगरानी की व्यवस्था होनी चाहिए। यदि किसी क्षेत्र में बार-बार शिकायतें सामने आती हैं तो वहां पुलिस, प्रशासन और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की संयुक्त बैठक कर स्थिति की समीक्षा की जा सकती है।
समस्या का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू नशे की गिरफ्त में आ चुके युवाओं को बाहर निकालना है। हर नशा करने वाला व्यक्ति अपराधी नहीं होता। कई मामलों में व्यक्ति खुद नशे की लत से बाहर निकलना चाहता है, लेकिन उचित मदद नहीं मिलने के कारण ऐसा नहीं कर पाता। ऐसे लोगों को चिकित्सकीय परामर्श, काउंसलिंग और पुनर्वास सेवाओं से जोड़ना जरूरी है। परिवारों को भी यह समझाने की जरूरत है कि नशे की समस्या को छिपाने के बजाय समय रहते विशेषज्ञों की मदद लेना बेहतर है।
स्कूल और कॉलेज स्तर पर जागरूकता अभियान भी लगातार चलाए जाने चाहिए। केवल एक दिन का कार्यक्रम या भाषण पर्याप्त नहीं होगा। विद्यार्थियों को नशे के शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और सामाजिक नुकसान के बारे में सरल भाषा में जानकारी दी जानी चाहिए। शिक्षकों और अभिभावकों को भी ऐसे संकेतों के बारे में जागरूक किया जा सकता है, जिनसे पता चले कि कोई बच्चा गलत संगत या नशे की ओर बढ़ रहा है।
इन इलाकों में खेल और युवा गतिविधियों को बढ़ावा देना भी समाधान का अहम हिस्सा हो सकता है। युवाओं को खेल मैदान, पुस्तकालय, कौशल विकास, रोजगार प्रशिक्षण और सामुदायिक गतिविधियों से जोड़ने की जरूरत है। खाली समय और सकारात्मक गतिविधियों की कमी कई बार युवाओं को गलत संगत की ओर ले जा सकती है। इसलिए नशे के खिलाफ अभियान को केवल ‘नशा मत करो’ तक सीमित रखने के बजाय युवाओं को बेहतर विकल्प उपलब्ध कराने पर भी ध्यान देना चाहिए।
स्थानीय नागरिकों की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण है। यदि किसी व्यक्ति को नशीले पदार्थों की बिक्री या सप्लाई की जानकारी है तो उसे उचित माध्यम से पुलिस या संबंधित विभाग तक पहुंचाया जाना चाहिए। हालांकि शिकायत करने वाले लोगों की पहचान और सुरक्षा को लेकर भी व्यवस्था मजबूत होनी चाहिए, ताकि लोग बिना डर के जानकारी साझा कर सकें। मोहल्ला स्तर पर जागरूक नागरिक समितियां बनाकर पुलिस और प्रशासन के साथ समन्वय किया जा सकता है।
जनप्रतिनिधियों को भी इस समस्या पर नियमित रूप से बैठक करनी चाहिए। वार्ड स्तर पर यह पता लगाया जा सकता है कि किन स्थानों पर सबसे ज्यादा शिकायतें आती हैं, किन क्षेत्रों में स्ट्रीट लाइट, सीसीटीवी या पुलिस गश्त की जरूरत है और कहां युवाओं के लिए सामुदायिक गतिविधियां शुरू की जा सकती हैं। स्थानीय समस्याओं की पहचान के लिए नागरिकों से सीधे संवाद भी जरूरी है।
सीसीटीवी कैमरों की व्यवस्था और खराब स्ट्रीट लाइट को ठीक करना भी कई स्थानों पर मददगार हो सकता है। जिन सार्वजनिक स्थानों पर संदिग्ध गतिविधियों की शिकायतें मिलती हैं, वहां पर्याप्त रोशनी और निगरानी व्यवस्था होने से कानून-व्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है। हालांकि तकनीकी निगरानी के साथ मानवीय निगरानी भी जरूरी है।
नशे के कारोबार के खिलाफ कार्रवाई करते समय यह भी सुनिश्चित करना जरूरी है कि निर्दोष लोगों को परेशान न किया जाए। कार्रवाई ठोस सूचना और कानून के मुताबिक होनी चाहिए। इससे पुलिस और आम जनता के बीच भरोसा मजबूत होगा। जनता का विश्वास किसी भी नशामुक्ति अभियान की सफलता के लिए महत्वपूर्ण है।
एक और जरूरी पहलू यह है कि नशे के खिलाफ कार्रवाई को लगातार जारी रखा जाए। अक्सर किसी घटना के बाद कुछ दिनों तक अभियान तेज होता है और फिर धीरे-धीरे सामान्य स्थिति लौट आती है। इसके बजाय संवेदनशील क्षेत्रों की नियमित समीक्षा होनी चाहिए। गिरफ्तारियों, बरामदगी, शिकायतों, पुनर्वास और जागरूकता अभियानों का रिकॉर्ड रखकर यह देखा जा सकता है कि कार्रवाई का वास्तविक असर क्या हो रहा है।
वार्ड 80 के मद्रासी कॉलोनी, गांधी ग्राम, ब्रह्मपुरी, लोहियानगर, महबूब कॉलोनी और बाजाद कॉलोनी जैसे क्षेत्रों के लिए एक संयुक्त कार्ययोजना बनाई जा सकती है। इसमें पुलिस, प्रशासन, नगर निगम, स्वास्थ्य विभाग, शिक्षा विभाग, स्थानीय जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों को शामिल किया जा सकता है। प्रत्येक विभाग की जिम्मेदारी तय होने से अभियान केवल कागजों तक सीमित नहीं रहेगा।
इस पूरी समस्या का स्थायी समाधान तभी संभव है जब कार्रवाई और पुनर्वास दोनों को साथ लेकर चला जाए। एक तरफ नशीले पदार्थों की सप्लाई करने वालों के खिलाफ कानून के तहत सख्त कार्रवाई हो, वहीं दूसरी तरफ नशे की लत से जूझ रहे लोगों को इलाज और सामाजिक सहयोग मिले। युवाओं को शिक्षा, खेल, कौशल और रोजगार से जोड़ना इस लड़ाई का सबसे मजबूत सामाजिक पक्ष हो सकता है।
नशे के खिलाफ लड़ाई किसी एक विभाग की जिम्मेदारी नहीं है। पुलिस को कार्रवाई करनी होगी, प्रशासन को निगरानी और समन्वय करना होगा, स्वास्थ्य विभाग को पुनर्वास पर ध्यान देना होगा, स्कूलों और अभिभावकों को बच्चों पर नजर रखनी होगी और समाज को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। जब इन सभी स्तरों पर एक साथ काम होगा, तभी नशे के खिलाफ अभियान को वास्तविक सफलता मिल सकती है।
देहरादून के वार्ड 80 में रहने वाले लोगों की चिंता को केवल शिकायत के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। यदि किसी इलाके के नागरिक लंबे समय से नशे के कारोबार की समस्या उठा रहे हैं तो उनकी शिकायतों की गंभीरता से जांच और तथ्यात्मक सत्यापन जरूरी है। इसके बाद समस्या वाले स्थानों की पहचान कर लक्ष्य आधारित कार्रवाई की जा सकती है।
‘ड्रग फ्री देवभूमि’ का लक्ष्य केवल सरकारी अभियान नहीं, बल्कि समाज के भविष्य से जुड़ा विषय है। उत्तराखंड के युवाओं को नशे से बचाना और नशे की गिरफ्त में आ चुके लोगों को वापस सामान्य जीवन से जोड़ना सामूहिक जिम्मेदारी है। वार्ड 80 के इन इलाकों में भी यदि शिकायतों पर लगातार कार्रवाई, सप्लाई नेटवर्क की जांच, पुनर्वास, जागरूकता, खेल और रोजगार के अवसरों पर एक साथ काम किया जाए तो हालात में बदलाव की राह तैयार हो सकती है।
अब जरूरत इस बात की है कि नशे के खिलाफ कार्रवाई केवल अभियान के रूप में नहीं, बल्कि लगातार चलने वाली व्यवस्था के रूप में दिखाई दे। स्थानीय लोगों की शिकायत सुनी जाए, उनकी जानकारी का सत्यापन हो, दोषियों पर कानून के अनुसार कार्रवाई हो और युवाओं के लिए सकारात्मक वातावरण तैयार किया जाए। यही रास्ता नशे की समस्या को जड़ से कम करने और देहरादून के इन क्षेत्रों को सुरक्षित बनाने की दिशा में ठोस कदम साबित हो सकता है।
