सलीम रज़ा (पत्रकार)
वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन विरले नायकों में से हैं, जिनका योगदान हथियार उठाने से नहीं, बल्कि नैतिक साहस और सत्य के पक्ष में खड़े होने से जुड़ा है। वे उस दौर के सैनिक थे, जब अंग्रेजी हुकूमत का आदेश ही कानून माना जाता था, लेकिन उन्होंने यह साबित कर दिया कि किसी भी आदेश से बड़ा मानवता और राष्ट्रधर्म होता है। उनका नाम आते ही पेशावर कांड की वह ऐतिहासिक घटना स्मरण में आती है, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन को नई चेतना और दिशा दी।
वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली का जन्म उत्तराखंड की वीरभूमि में हुआ। पहाड़ की सादगी, अनुशासन और स्वाभिमान उनके व्यक्तित्व में बचपन से ही रचा-बसा था। वे ब्रिटिश भारतीय सेना में भर्ती हुए और अपनी ईमानदारी तथा कर्तव्यनिष्ठा के कारण एक जिम्मेदार सैनिक के रूप में पहचाने गए। उस समय देश आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहा था और जगह-जगह अंग्रेजी शासन के खिलाफ आंदोलन हो रहे थे।
सन 1930 में पेशावर में घटित हुआ पेशावर कांड भारतीय इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय है। उस समय खुदाई खिदमतगार आंदोलन से जुड़े निहत्थे लोग अंग्रेजी शासन के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे। ब्रिटिश अधिकारियों ने आंदोलन को कुचलने के लिए सेना को गोली चलाने का आदेश दिया। इसी दौरान वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली की पलटन को प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने का हुक्म दिया गया।
यहीं से उनके जीवन का सबसे बड़ा और साहसिक निर्णय सामने आया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में निहत्थी जनता पर गोली चलाने से इनकार कर दिया। यह कोई साधारण फैसला नहीं था। उस दौर में आदेश न मानने का मतलब था कठोर सजा, जेल, यातनाएं और यहां तक कि मौत भी। इसके बावजूद उन्होंने अपने अंतरात्मा की आवाज सुनी और अन्याय के आगे झुकने से मना कर दिया। उनका यह निर्णय केवल एक व्यक्ति का विरोध नहीं था, बल्कि अंग्रेजी शासन की नैतिकता पर सीधा प्रश्न था।
वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली के इस कदम का प्रभाव पूरे देश में पड़ा। पेशावर कांड ने यह संदेश दिया कि भारतीय सैनिक भी अब अंग्रेजों के दमन का हिस्सा बनने को तैयार नहीं हैं। इससे स्वतंत्रता आंदोलन को नया बल मिला और अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिल गई। यह घटना इतिहास में इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें हथियार नहीं, बल्कि नैतिक साहस ने क्रांति का कार्य किया।
आदेश न मानने की सजा के तौर पर वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली को कठोर दंड दिया गया। उन्हें सेना से बाहर कर दिया गया और लंबे समय तक कारावास तथा यातनाओं का सामना करना पड़ा। लेकिन इन कठिन परिस्थितियों में भी उनका आत्मविश्वास और देशप्रेम डगमगाया नहीं। उन्होंने कभी अपने फैसले पर पछतावा नहीं किया और हमेशा गर्व के साथ कहा कि उन्होंने वही किया जो सही था।
आज जब हम वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली को याद करते हैं, तो यह समझ में आता है कि आज़ादी केवल बड़े आंदोलनों या युद्धों से नहीं मिली, बल्कि ऐसे ही साहसी और नैतिक फैसलों से मिली है। उन्होंने यह सिखाया कि सच्ची बहादुरी केवल ताकत में नहीं, बल्कि सही और गलत के बीच खड़े होने की क्षमता में होती है।
उत्तराखंड की धरती ने देश को हमेशा वीर सपूत दिए हैं और वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली उसी परंपरा के प्रतीक हैं। उनका जीवन आज की पीढ़ी के लिए एक बड़ा संदेश है कि किसी भी परिस्थिति में मानवता, सत्य और राष्ट्रहित से समझौता नहीं करना चाहिए। जब सत्ता या व्यवस्था गलत दिशा में जाए, तब उसके विरुद्ध खड़े होना ही सच्चा देशप्रेम है।
वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली का नाम इतिहास के पन्नों में केवल एक घटना के रूप में नहीं, बल्कि एक विचार के रूप में दर्ज है। उनका साहस, त्याग और नैतिक दृढ़ता आज भी हमें प्रेरित करती है कि हम अन्याय के सामने चुप न रहें। उनकी जयंती या स्मरण केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि यह संकल्प लेने का अवसर है कि हम भी अपने जीवन में सत्य और न्याय के पक्ष में खड़े होंगे। यही वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली की सबसे बड़ी विरासत है।

