सलीम रज़ा (पत्रकार )
हर नया साल हमारे जीवन में एक नई सुबह की तरह आता है। पुराने साल की अंतिम रात जब विदा लेती है, तो उसके साथ बीते समय की यादें, अधूरे सपने, पूरी हुई उपलब्धियाँ, खोए हुए लोग, बिखरे रिश्ते और आने वाले कल की अनगिनत उम्मीदें—सब हमारे मन को घेर लेते हैं। नया साल केवल तारीखों का बदलाव नहीं, बल्कि समय के आईने में खड़े होकर खुद को देखने का अवसर है। हर नया साल यह सवाल करता है—क्या हमने बीते साल से कुछ सीखा? क्या हम पहले से बेहतर इंसान बने? क्या समाज थोड़ा और संवेदनशील हुआ? इन सवालों के जवाब ही नए साल को सार्थक बनाते हैं।
बीता हुआ साल अपने साथ अनुभवों की गठरी लेकर आता है। किसी के लिए यह वर्ष सफलता, पदोन्नति, उपलब्धि और खुशियों से भरा रहा, तो किसी के लिए संघर्ष, असफलता, बीमारी और पीड़ा का पर्याय बन गया। जीवन की यही सच्चाई है कि हर साल सभी के लिए एक जैसा नहीं होता। बीते साल ने हमें यह सिखाया कि जीवन में स्थिरता केवल भ्रम है। परिस्थितियाँ कभी भी बदल सकती हैं। जो आज हमारे पास है, वह कल न भी हो। इस अनिश्चितता ने हमें धैर्य, सहनशीलता और आत्मबल का महत्व समझाया। जो लोग इन सीखों को समझ पाते हैं, वही नए साल में मजबूती के साथ आगे बढ़ते हैं।
नया साल उम्मीदों का प्रतीक है। चाहे बीता साल कितना भी कठिन क्यों न रहा हो, नया साल मन को यह विश्वास देता है कि अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। हर नया साल एक खाली पन्ने की तरह होता है, जिस पर हम अपने कर्मों से नई कहानी लिख सकते हैं। लोग नए संकल्प लेते हैं—कोई अपने स्वास्थ्य को लेकर, कोई अपने करियर को लेकर, कोई रिश्तों को सुधारने का, तो कोई आत्मविकास का। लेकिन संकल्प लेना आसान है, निभाना कठिन। नया साल तभी सार्थक बनता है जब संकल्प आदतों में बदलें और व्यवहार में उतरें।
आज नया साल केवल व्यक्तिगत अवसर नहीं रहा, बल्कि एक बड़ा सामाजिक उत्सव बन चुका है। शहरों में रौशनी, होटल और क्लबों में पार्टियाँ, सड़कों पर भीड़ और सोशल मीडिया पर शुभकामनाओं की बाढ़—यह सब नए साल की पहचान बन गया है। उत्सव मनाना गलत नहीं है। खुश होना, मिलना-जुलना, आनंद लेना—यह मानव स्वभाव का हिस्सा है। लेकिन जब उत्सव अति, दिखावे और अनुशासनहीनता में बदल जाए, तब वह समाज के लिए चिंता का विषय बन जाता है। हर साल नए साल की रात सड़क दुर्घटनाएँ, कानून व्यवस्था की समस्याएँ और अस्पतालों में बढ़ती भीड़ यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हमने खुशी की परिभाषा को गलत दिशा में मोड़ दिया है। सच्ची खुशी शोर में नहीं, संतुलन में होती है।
नया साल आते ही नशा, तेज़ संगीत और देर रात तक जश्न आम बात हो गई है। युवा पीढ़ी ही नहीं, बड़े भी इस प्रवृत्ति का हिस्सा बनते जा रहे हैं। यह केवल नैतिकता का सवाल नहीं, जिम्मेदारी का है। जब उत्सव दूसरों की शांति छीन ले, जब खुशी किसी और के लिए भय या परेशानी बन जाए, तब समाज को रुककर सोचना चाहिए। हमारी संस्कृति ने हमेशा आनंद के साथ मर्यादा का संतुलन सिखाया है। नया साल उस संतुलन को याद करने का अवसर भी है।
नया साल रिश्तों के लिए सबसे बड़ा अवसर और सबसे बड़ी परीक्षा दोनों है। आज का जीवन इतना तेज़ हो गया है कि रिश्तों के लिए समय निकालना मुश्किल हो गया है। परिवार एक ही घर में रहते हुए भी भावनात्मक रूप से दूर हो गया है। नए साल की शुभकामनाएँ अब संदेशों तक सीमित हो गई हैं। वास्तविक संवाद, साथ बैठना, हालचाल पूछना—ये सब धीरे-धीरे कम हो रहा है। नया साल हमें यह याद दिलाता है कि रिश्ते समय माँगते हैं। कोई भी रिश्ता अपने-आप नहीं चलता; उसे संजोना और निभाना पड़ता है।
नए साल के जश्न के बीच समाज का एक बड़ा वर्ग अक्सर अनदेखा रह जाता है—वरिष्ठ नागरिक। जिन्होंने अपना जीवन परिवार और समाज को दिया, वही आज कई बार अकेलेपन का सामना कर रहे हैं। नया साल हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम अपने बुजुर्गों को केवल जिम्मेदारी समझ रहे हैं या सम्मान भी दे रहे हैं। उनका अनुभव, उनकी सीख और उनका आशीर्वाद समाज की सबसे बड़ी पूंजी है।
नया साल युवाओं के लिए नई संभावनाएँ और चुनौती लेकर आता है। उनका जोश, ऊर्जा और उत्साह देश की सबसे बड़ी शक्ति है। लेकिन यह भी सच है कि आज का युवा भ्रम, तुलना और दबाव से जूझ रहा है। सोशल मीडिया ने अपेक्षाओं का बोझ बढ़ा दिया है। नया साल युवाओं के लिए यह तय करने का समय है कि वे दिखावे की दौड़ में शामिल होंगे या निर्माण की राह चुनेंगे। यदि युवा अपनी ऊर्जा को शिक्षा, नवाचार, सेवा और उद्यमिता में लगाएँ, तो नया साल न केवल उनका बल्कि पूरे समाज और देश का भविष्य बदल सकता है।
नया साल केवल बाहरी बदलाव का नहीं, बल्कि भीतरी संतुलन का भी समय है। आज तनाव, अवसाद और अकेलापन तेजी से बढ़ रहे हैं। नए साल पर खुश दिखने का दबाव कई बार मानसिक बोझ बन जाता है। हमें यह समझना होगा कि हर व्यक्ति का नया साल अनुभव अलग होता है। नया साल दूसरों से तुलना करने का नहीं, बल्कि खुद को समझने का समय होना चाहिए।
नया साल केवल व्यक्तिगत अवसर नहीं, सामूहिक अवसर भी है। हम किस तरह का समाज बना रहे हैं—यह सवाल नए साल पर और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। क्या हम दूसरों के प्रति संवेदनशील हैं? क्या हम पर्यावरण की रक्षा कर रहे हैं? क्या हम कमजोर वर्गों के लिए आवाज़ उठाते हैं? छोटे-छोटे कदम—ईमानदारी, सहयोग, सहानुभूति—समाज को बेहतर बना सकते हैं।
नया साल प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी को भी याद दिलाता है। जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों का दोहन आने वाले वर्षों की सबसे बड़ी चुनौती है। नया साल संकल्प लेने का अवसर है—कम प्लास्टिक, अधिक हरियाली, जल संरक्षण और जिम्मेदार उपभोग का।
नया साल हमें ठहरकर अपने भीतर झाँकने का मौका देता है। क्या हम बेहतर इंसान बने? क्या हमने किसी के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाया? क्या हमने अपनी गलतियों को स्वीकार किया? इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि नया साल कितना सार्थक होगा।

