देहरादून।
उत्तराखंड में शादी के बाद अन्य राज्यों से आकर बसी महिलाओं को शिक्षक भर्ती में आरक्षण का लाभ भले ही नहीं दिया जा रहा हो, लेकिन शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) में उन्हें आरक्षण का लाभ मिल रहा है। इस विरोधाभासी स्थिति को लेकर शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
दरअसल, राज्य में शादी के बाद बसी अन्य राज्यों की अनुसूचित जाति और जनजाति की महिलाओं को आरक्षण देने संबंधी याचिका को हाईकोर्ट पहले ही खारिज कर चुका है। इसके बावजूद शिक्षा विभाग ने पूर्व में शिक्षक भर्ती के दौरान न केवल इन महिलाओं से आवेदन स्वीकार किए, बल्कि उनका चयन भी कर लिया था।
हाईकोर्ट के फैसले के बाद अब ऐसी महिलाओं को शिक्षक भर्ती में आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा रहा है और चयन होने के बावजूद उन्हें नियुक्ति पत्र भी जारी नहीं किए गए हैं। हालांकि, इसके विपरीत टीईटी परीक्षा में इन्हें आरक्षित वर्ग का लाभ दिया जा रहा है, जिससे असमंजस की स्थिति बनी हुई है।
टीईटी में आरक्षण का लाभ लेकर उत्तीर्ण होने वाली ये महिलाएं बाद में शिक्षक भर्ती प्रक्रिया में शामिल हो रही हैं। हालांकि, शिक्षक भर्ती में इन्हें आरक्षित वर्ग के बजाय सामान्य वर्ग की सूची में रखा जा रहा है। पूर्व में 2900 पदों पर हुई शिक्षक भर्ती में ऐसी कुछ महिलाओं का चयन हुआ था। वर्तमान में चल रही 1670 पदों की भर्ती में भी इस श्रेणी की महिलाओं ने आवेदन किया है।
चयन हुआ, लेकिन नियुक्ति नहीं
शिक्षा विभाग ने 2900 पदों की भर्ती प्रक्रिया के दौरान शादी के बाद उत्तराखंड में बसी अन्य राज्यों की महिलाओं का चयन तो किया, लेकिन हाईकोर्ट के निर्णय के बाद उन्हें नियुक्ति पत्र जारी नहीं किए गए।
टीईटी में पास होने के लिए निर्धारित अंक
टीईटी परीक्षा में आरक्षित वर्ग (एससी और एसटी) के अभ्यर्थियों को 60 अंक लाने होते हैं, जबकि ओबीसी वर्ग के लिए 75 अंक और सामान्य वर्ग के लिए 90 अंक निर्धारित हैं।
एससीईआरटी की निदेशक बंदना गर्ब्याल ने बताया कि टीईटी के लिए ऑनलाइन आवेदन किए जाते हैं और काउंसलिंग के दौरान ऐसे अभ्यर्थियों की पहचान की जा सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि जाति प्रमाण पत्र जारी करने से पहले स्थानीय प्रशासन द्वारा इसकी गंभीरता से जांच की जानी चाहिए।
