सलीम रज़ा (पत्रकार)
आज के दौर में इश्क भी टी-20 क्रिकेट की तरह हो गया है—समय कम, उम्मीदें बड़ी, जोखिम भरपूर और हर गेंद पर मैच का रुख बदलने की पूरी संभावना। पहले प्रेम को साधना पड़ता था, अब साधना की जगह स्वाइप ने ले ली है। पहले प्रेम-पत्र लिखने में कई दिन लगते थे और जवाब आने में उससे भी ज्यादा धैर्य चाहिए होता था। अब उधर से “हाय” आया नहीं कि इधर दिल ने ड्रेसिंग रूम से हेलमेट पहनकर मैदान में उतरने की तैयारी शुरू कर दी। सामने वाला ऑनलाइन दिख जाए तो लगता है किस्मत ने टॉस जीत लिया, और अगर मैसेज पढ़कर जवाब न दे तो समझिए टीम पावरप्ले में ही तीन विकेट खो चुकी है।
इश्क का यह नया संस्करण बड़ा लोकतांत्रिक है। इसमें हर किसी को बल्लेबाज बनने का अधिकार है और हर किसी के हाथ में अपना विकेट भी है। फर्क सिर्फ इतना है कि क्रिकेट में अंपायर होता है, यहां कोई नहीं। क्रिकेट में नो-बॉल पर फ्री हिट मिल जाती है, प्रेम में गलतफहमी की नो-बॉल पर कभी-कभी पूरा रिश्ता ही आउट हो जाता है। क्रिकेट में डीआरएस है, प्रेम में डीआरएस की सुविधा होती तो शायद दुनिया में इतने ब्रेकअप नहीं होते। “तुमने मैसेज क्यों नहीं किया?”—“मैंने किया था।” “कहां किया था?”—“मन में।” बस, यही वह तकनीकी गड़बड़ी है जिसकी वजह से प्रेम का पूरा स्कोरकार्ड खराब हो जाता है।
आजकल इश्क में लक का भी बड़ा योगदान है। आप कितने ही सुंदर, समझदार, पढ़े-लिखे और संस्कारी क्यों न हों, अगर सामने वाले की पसंद किसी और तरह की है तो आपकी सारी खूबियां नेट प्रैक्टिस में ही पड़ी रह जाती हैं। दूसरी तरफ कोई ऐसा व्यक्ति भी प्रेम के फाइनल में पहुंच जाता है जिसकी सबसे बड़ी योग्यता यह होती है कि उसने सही समय पर सही इमोजी भेज दिया। कभी-कभी पूरा प्रेम संबंध सिर्फ इस बात पर टिका होता है कि सामने वाले ने “हम्म” लिखा है या “हम्म्म”। एक अतिरिक्त ‘म’ प्रेम की पिच को हरा-भरा कर सकता है और उसकी अनुपस्थिति सूखी पिच की तरह रिश्ते को स्पिन करा सकती है।
रिस्क भी कम नहीं है। आज प्रेम करना वैसा ही है जैसे बिना हेलमेट के तेज गेंदबाज के सामने बल्लेबाजी करना। पता नहीं गेंद यॉर्कर होगी, बाउंसर होगी या सीधे दिल पर लगेगी। पहले प्रेम में लोग दिल देते थे, अब दिल के साथ अपना डेटा, पासवर्ड, लोकेशन, चैट हिस्ट्री और कभी-कभी पूरी जिंदगी का बैकअप भी दे देते हैं। फिर जब रिश्ता टूटता है तो प्रेमी-प्रेमिका नहीं टूटते, सर्वर टूटने की चिंता शुरू हो जाती है। किसने क्या कहा, किसने क्या भेजा, किसने किसे कब लाइक किया—सारा हिसाब अचानक राष्ट्रीय अभिलेखागार का दस्तावेज बन जाता है।
पुराने जमाने के प्रेम में खतरा यह था कि पिता जी को पता चल जाएगा। आज खतरा यह है कि स्क्रीनशॉट किसके पास चला जाएगा। पहले प्रेमी पेड़ के नीचे मिलते थे, आज कॉफी शॉप में मिलते हैं और साथ में मोबाइल कैमरा भी बैठा होता है। पहले प्रेम की गवाही चांद देता था, अब सोशल मीडिया स्टोरी देती है। पहले प्रेमिका कहती थी, “तुम मुझे कितना चाहते हो?” अब सवाल कुछ ज्यादा व्यावहारिक है—“मेरी फोटो पर हार्ट क्यों नहीं किया?” प्रेम की गहराई अब कई बार भावनाओं से नहीं, नोटिफिकेशन की आवृत्ति से मापी जाती है।
टी-20 की सबसे बड़ी खासियत है कि यहां डिफेंसिव क्रिकेट की कोई खास इज्जत नहीं। प्रेम में भी यही हाल है। जो व्यक्ति पहले भावनाओं को समझने, सामने वाले को जानने और रिश्ते को समय देने की बात करता है, उसे आधुनिक प्रेम बाजार में अक्सर “ओवरथिंकिंग” का मरीज घोषित कर दिया जाता है। उधर सामने वाला दो दिन में तय कर लेता है कि यही इंसान जीवनसाथी है, तीसरे दिन शादी के नाम पर घबरा जाता है और चौथे दिन कहता है—“मुझे थोड़ा स्पेस चाहिए।” प्रेम का यह स्पेस इतना विशाल होता है कि उसमें दूसरा रिश्ता भी आराम से पार्क हो सकता है।
इश्क में अब टॉस भी बहुत महत्वपूर्ण है। पहला मैसेज कौन करेगा, पहले कॉल कौन करेगा, पहले “आई मिस यू” कौन बोलेगा—इन सबको लेकर ऐसी रणनीति बनाई जाती है जैसे भारत-पाकिस्तान का मुकाबला हो। दोनों पक्ष मोबाइल हाथ में लेकर बैठे हैं और मन ही मन सोच रहे हैं कि पहले मैं क्यों लिखूं? सामने वाला भी यही सोच रहा है। परिणाम यह कि दोनों की भावनाएं ड्रेसिंग रूम में बैठी रह जाती हैं और रिश्ता बिना मैच खेले वॉकओवर में हार जाता है।
फिर आता है ऑनलाइन स्टेटस का खेल। सामने वाला पांच मिनट पहले ऑनलाइन था और आपको जवाब नहीं दिया—यह सूचना प्रेमी के लिए वही महत्व रखती है जो शेयर बाजार में सेंसेक्स की गिरावट का निवेशक के लिए। उसके बाद जांच शुरू होती है। किससे चैट कर रहा था? मेरी स्टोरी देखी या नहीं? आखिरी बार कब ऑनलाइन आया? प्रोफाइल फोटो क्यों बदली? स्टेटस में यह गाना क्यों लगाया? बेचारा प्रेमी अब प्रेमी कम और साइबर सेल का अस्थायी कर्मचारी ज्यादा दिखाई देता है।
इस आधुनिक प्रेम में किस्मत की भूमिका भी निराली है। कभी सही इंसान गलत समय पर मिलता है, कभी गलत इंसान सही समय पर और कभी सही इंसान मिलता ही नहीं, लेकिन उसकी जगह उसका “बेस्ट फ्रेंड” जरूर मिल जाता है। कई बार प्रेम का मैच इसलिए नहीं जीत पाते क्योंकि हम अपने मन की पिच पर बल्लेबाजी कर रहे होते हैं और सामने वाला किसी दूसरी पिच पर मैच खेल रहा होता है। हम समझ रहे होते हैं कि मुकाबला प्रेम का है, जबकि सामने वाला इसे सिर्फ फ्रेंडशिप लीग का अभ्यास मैच मान रहा होता है।
टी-20 में बल्लेबाज को हर गेंद पर चौका-छक्का मारने का दबाव रहता है। आधुनिक प्रेम में भी यही अपेक्षा है। रोज बात हो, रोज ध्यान मिले, रोज तारीफ हो, रोज कुछ नया हो। एक दिन बातचीत कम हुई नहीं कि प्रेम का नेट रनरेट गिरने लगता है। पहले रिश्तों में खामोशी भी संवाद हुआ करती थी, अब खामोशी को “इंटरेस्ट खत्म” समझ लिया जाता है। पहले दो लोग चुपचाप बैठे रह सकते थे, अब दोनों मोबाइल पर व्यस्त होकर भी यह देख रहे होते हैं कि सामने वाला ऑनलाइन होकर किससे बात कर रहा है।
मगर असली समस्या इश्क के टी-20 होने में नहीं है। समस्या यह है कि हमने प्रेम को खेल समझ लिया है, लेकिन खेल की तरह उसकी हार भी स्वीकार करना नहीं सीखा। टी-20 में हारने वाली टीम अगले मैच की तैयारी करती है। प्रेम में हारने वाला व्यक्ति कभी-कभी महीनों तक पुराने चैट पढ़ता रहता है और विशेषज्ञों की तरह हर संदेश का पोस्टमार्टम करता है। “उसने उस दिन ‘ठीक है’ क्यों लिखा था?” भाई, वह ठीक है ही लिखना चाहती थी, भारतीय अर्थव्यवस्था का बजट पेश नहीं कर रही थी।
और फिर सोशल मीडिया ने प्रेम को दर्शक भी दे दिए हैं। अब दो लोगों का रिश्ता सिर्फ दो लोगों का नहीं रहता। दोस्तों को पता है, रिश्तेदारों को अंदाजा है, पड़ोसियों को शक है और इंटरनेट को सबूत चाहिए। रिश्ता अच्छा चल रहा हो तो तस्वीरें आती हैं—“फॉरएवर”, “माय पर्सन”, “बेस्ट पार्टनर”। रिश्ता टूट जाए तो वही लोग कुछ दिनों बाद ऐसे मौन धारण कर लेते हैं जैसे संयुक्त राष्ट्र ने युद्धविराम घोषित कर दिया हो। जो कल तक एक-दूसरे को “जान” कह रहे थे, आज एक-दूसरे की पोस्ट पर ऐसे गुजरते हैं जैसे बिजली का बिल देखकर आदमी खंभे के दूसरी तरफ चला जाए।
फिर भी इश्क का आकर्षण कम नहीं हुआ है। बल्कि जोखिम बढ़ने के साथ उसका रोमांच भी बढ़ गया है। जैसे टी-20 में आखिरी गेंद तक पता नहीं होता कि कौन जीतेगा, वैसे ही प्रेम में भी आखिरी क्षण तक कोई गारंटी नहीं होती। यही अनिश्चितता उसे मजेदार बनाती है। फर्क सिर्फ इतना है कि क्रिकेट में खिलाड़ी मैच हारकर ड्रेसिंग रूम लौट जाता है, प्रेम में आदमी अपने कमरे में लौटकर पुराने गाने सुनता है और खुद को समझाता है कि “वह मेरे लायक ही नहीं थी।” जबकि सच्चाई यह होती है कि दोनों ही शायद एक-दूसरे के लायक नहीं थे—बस मैच का टाइमिंग खराब था।
आज का इश्क इसलिए टी-20 है क्योंकि इसमें भावनाएं टेस्ट मैच वाली हैं, लेकिन धैर्य पांच ओवर जितना भी नहीं। उम्मीदें वनडे वाली हैं, लेकिन बातचीत पावरप्ले जैसी। जोखिम टेस्ट क्रिकेट से ज्यादा और परिणाम कभी-कभी गली क्रिकेट जैसा। लक का सिक्का उछलता है, रिस्क का बल्ला घूमता है और दिल स्टेडियम की सबसे नाजुक गेंद बनकर हवा में रहता है।
शायद इसलिए आज के दौर में इश्क करने वालों को क्रिकेट का एक नियम जरूर याद रखना चाहिए—हर गेंद पर छक्का मारने की कोशिश करने वाला बल्लेबाज दर्शकों का मनोरंजन तो कर सकता है, लेकिन पवेलियन भी जल्दी लौट सकता है। प्रेम में भी हर बातचीत को रोमांस, हर मुलाकात को प्रतिबद्धता और हर मुस्कान को इश्क समझना जरूरी नहीं। कभी-कभी गेंद को छोड़ देना भी समझदारी है, कभी डिफेंस खेलना भी जरूरी है और कभी-कभी यह स्वीकार करना भी कि सामने वाला आपकी टीम का खिलाड़ी नहीं है।
आखिर इश्क हो या टी-20, लक और रिस्क दोनों साथ चलते हैं। फर्क इतना है कि क्रिकेट में मैच खत्म होने पर स्कोरबोर्ड साफ दिखाई देता है, प्रेम में स्कोरबोर्ड अक्सर दिल के अंदर लगा रहता है। वहां रन कितने बने, विकेट कितने गिरे और मैच किसने जीता—इसका फैसला वर्षों बाद भी नहीं हो पाता। और मजेदार बात यह कि इतने जोखिम के बाद भी इंसान अगली बार फिर मैदान में उतरता है, फिर बल्ला उठाता है, फिर टॉस की उम्मीद करता है और फिर कहता है—“इस बार शायद किस्मत साथ दे।”
यही तो इश्क की सबसे बड़ी विडंबना है—इंसान जानता है कि मैच फिक्स नहीं है, अंपायर भरोसे का नहीं है, पिच कब पलट जाए पता नहीं, सामने वाला किस गेंद पर आउट कर दे कोई भरोसा नहीं, फिर भी दिल टिकट लेकर स्टेडियम में पहुंच जाता है। क्योंकि आखिरकार दिल को भी कभी-कभी टी-20 खेलना पसंद है—टेस्ट मैच की तरह जिंदगी भर इंतजार करने से बेहतर है कि थोड़े ओवर में ही सही, चौका-छक्का मारकर देखा जाए। हार गए तो अनुभव मिलेगा, जीत गए तो शादी की तैयारी शुरू होगी, और अगर मैच बारिश में धुल गया तो कम से कम सोशल मीडिया पर स्टेटस लगाने के लिए एक नया दर्द तो मिल ही जाएगा।

