रुड़की। हिमालय अब केवल बर्फ और ठंड का क्षेत्र नहीं रह गया है। पर्वतीय इलाकों में तापमान तेजी से बढ़ रहा है और इसका सबसे अधिक असर 3,000 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में देखने को मिल रहा है। हिंदूकुश हिमालय में लगातार तीसरे वर्ष सामान्य से कम बर्फबारी और कम अवधि तक बर्फ टिकने की स्थिति सामने आई है। इससे पहाड़ों में बनने वाला प्राकृतिक जल भंडार लगातार कम हो रहा है, जिसका असर आने वाले समय में जल उपलब्धता और पर्यावरणीय संतुलन पर पड़ सकता है।
आईआईटी रुड़की के इंटरनेशनल सेंटर फॉर एक्सीलेंस इन डैम्स से जुड़े वैज्ञानिक प्रो. अंकित अग्रवाल के अनुसार, ऊंचाई बढ़ने के साथ तापमान में असामान्य वृद्धि को ‘ऊंचाई-निर्भर तापन’ कहा जाता है। इसका सीधा असर हिमपात और हिमनदों पर पड़ रहा है।
जम्मू-कश्मीर के ऊंचाई वाले क्षेत्रों के मौसम आंकड़ों में भी तापमान बढ़ने का रुझान सामने आया है। पहलगाम और गुलमर्ग जैसे क्षेत्रों में पिछले करीब दो दशकों के दौरान तापमान में लगभग एक डिग्री सेल्सियस तक वृद्धि दर्ज की गई है। कई पर्वतीय इलाकों में रात का न्यूनतम तापमान भी दिन के अधिकतम तापमान की तुलना में तेजी से बढ़ रहा है।
बर्फ घटने से बढ़ती है गर्मी
बर्फ की सफेद सतह सूर्य की किरणों का बड़ा हिस्सा परावर्तित कर देती है। लेकिन जब बर्फ कम होती है तो नीचे की चट्टान और मिट्टी अधिक सौर ऊर्जा सोखने लगती हैं। इससे जमीन का तापमान बढ़ता है और बची हुई बर्फ तेजी से पिघलने लगती है। इस तरह बर्फ कम होने और तापमान बढ़ने का एक दुष्चक्र बन जाता है।
बढ़ रहा आपदाओं का खतरा
हिमालय में बदलते मौसम का असर अचानक आने वाली प्राकृतिक आपदाओं के रूप में भी सामने आ रहा है। वर्ष 2013 की केदारनाथ त्रासदी, जुलाई 2023 में हिमाचल प्रदेश की विनाशकारी बाढ़ और अगस्त 2025 में उत्तरकाशी के धराली में कुछ ही मिनटों में आए मलबे के प्रवाह ने पर्वतीय क्षेत्रों की बढ़ती संवेदनशीलता को उजागर किया है।
अब बारिश की मात्रा से ज्यादा जरूरी उसकी रफ्तार और जगह
विशेषज्ञों के अनुसार भविष्य में केवल यह जानना पर्याप्त नहीं होगा कि किसी क्षेत्र में कुल कितनी बारिश हुई। यह भी पता लगाना जरूरी होगा कि बारिश किस घाटी में हुई, कितनी कम अवधि में हुई और उसके कारण नीचे स्थित कौन-सी बस्ती, सड़क, पुल या नदी प्रभावित हो सकती है।
इसके लिए ऊंचाई वाले क्षेत्रों में मौसम निगरानी केंद्रों का नेटवर्क बढ़ाने, हिमनद झीलों की नियमित निगरानी करने और जोखिम वाले क्षेत्रों में स्थित बस्तियों की पहचान करने की जरूरत है।
हिमालय में बढ़ता तापमान केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं है। इसका सीधा प्रभाव पानी, खेती, सड़क, पर्यटन और पर्वतीय आबादी की सुरक्षा पर पड़ सकता है। ऐसे में हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु और आपदा जोखिम की लगातार निगरानी अब पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गई है।
