देहरादून : उत्तराखंड के बिजली उपभोक्ताओं के लिए बड़ी राहत की खबर है। उत्तराखंड विद्युत नियामक आयोग ने यूपीसीएल के उत्तर प्रदेश से परिसंपत्तियों और देनदारियों के बंटवारे से जुड़े 5,900 करोड़ रुपये के दावे को खारिज कर दिया है। आयोग ने लंबी देरी और प्रशासनिक लापरवाही का बोझ उपभोक्ताओं पर डालने से साफ इनकार करते हुए सिर्फ 389.33 करोड़ रुपये की राशि मंजूर की है।
हर दिशा से जुड़ रहा "उत्तराखण्ड"
आयोग ने कहा कि 2003 में ट्रांसफर स्कीम बनने के बावजूद यूपीसीएल वर्षों तक इस मामले को लेकर सक्रिय नहीं हुआ। वर्ष 2013 के बाद करीब छह साल तक कोई पत्राचार नहीं हुआ और 2022 में स्कीम अधिसूचित होने के बाद भी मामला करीब चार साल तक आयोग के सामने नहीं लाया गया। ऐसे में निगम और शासन की प्रशासनिक लेटलतीफी का आर्थिक भार प्रदेश की जनता पर नहीं डाला जा सकता।
5,900 करोड़ के दावे में सिर्फ 936 करोड़ मूल राशि
स्वरोजगार एवं उद्यमिता योजनाएँ
आयोग के मुताबिक यूपीसीएल ने कुल 5,900.01 करोड़ रुपये का अतिरिक्त एआरआर दावा किया था। इसमें वास्तविक दावा सिर्फ 936.37 करोड़ रुपये था, जबकि करीब 4,963.65 करोड़ रुपये वर्षों की देरी के कारण चक्रवृद्धि आधार पर कैरिंग कॉस्ट के रूप में मांगे गए थे। आयोग ने कैरिंग कॉस्ट को पूरी तरह खारिज कर दिया।
शेयर पूंजी के आधार पर रिटर्न का दावा भी नामंजूर
यूपीसीएल ने केंद्र सरकार के उपक्रमों के 572 करोड़ रुपये के बकाये को राज्य सरकार की ओर से शेयर पूंजी में बदलने के आधार पर रिटर्न का दावा भी किया था। आयोग ने इस दावे को भी स्वीकार नहीं किया।
केवल 389.33 करोड़ रुपये मंजूर
आयोग के अध्यक्ष एमएल प्रसाद, सदस्य विधि अनुराग शर्मा और सदस्य तकनीकी प्रभात किशोर डिमरी ने मामले में जनसुनवाई के बाद यह निर्णय दिया। आयोग ने निम्न मदों में राशि को मंजूरी दी है—
मूल्यह्रास 288.70 करोड़ रुपये
रीजनेबल रिटर्न 97.75 करोड़ रुपये
कार्यशील पूंजी पर ब्याज 2.88 करोड़ रुपये
कैरिंग कॉस्ट: शून्य
कुल मंजूर राशि: 389.33 करोड़ रुपये
सरकार दे या आगामी टैरिफ में शामिल हो राशि
आयोग ने स्पष्ट किया कि फिलहाल बिजली दरों में कोई बढ़ोतरी नहीं की जा रही है। 389.33 करोड़ रुपये की मंजूर राशि को राज्य सरकार चाहे तो यूपीसीएल की सरकार के प्रति देनदारियों के साथ समायोजित कर सकती है। यदि ऐसा नहीं होता है तो इस राशि को आगामी टैरिफ प्रस्तावों में चरणबद्ध तरीके से शामिल करने पर विचार किया जाएगा, ताकि उपभोक्ताओं पर एकमुश्त आर्थिक बोझ न पड़े।
दो दशक बाद अधिसूचित हुई थी ट्रांसफर स्कीम
उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2000 के बाद नवंबर 2001 में उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड और नवगठित यूपीसीएल के बीच संपत्तियों व देनदारियों का बंटवारा किया गया था। 12 अक्तूबर 2003 को दोनों निगमों के बीच संपत्ति ट्रांसफर स्कीम तैयार हुई, लेकिन इसे राज्य सरकार की ओर से औपचारिक रूप से अधिसूचित होने में करीब दो दशक लग गए। यह स्कीम आठ मार्च 2022 को गजट में अधिसूचित हुई।
इसके बाद यूपीसीएल ने बची हुई संपत्तियों के आधार पर मूल्यह्रास, इक्विटी पर रिटर्न, कार्यशील पूंजी पर ब्याज और वर्षों की देरी की कैरिंग कॉस्ट जोड़कर 5,900.01 करोड़ रुपये के अतिरिक्त एआरआर का दावा किया था। आयोग के फैसले से इस दावे का बड़ा हिस्सा खारिज हो गया है और प्रदेश के बिजली उपभोक्ताओं पर तत्काल हजारों करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार पड़ने से राहत मिली है।

