भारत की मैन्युफैक्चरिंग MSMEs केवल व्यवसाय तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये रोजगार, नवाचार, निर्यात और देश की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने का मुख्य इंजन हैं। ये छोटी इकाइयां बड़े उद्योगों को जरूरी सामान मुहैया कराती हैं और घरेलू सप्लाई नेटवर्क का आधार बनती हैं। ग्रामीण और शहरी इलाकों के लाखों परिवारों की आजीविका भी इन्हीं पर निर्भर है। इसलिए देश के विकास का लक्ष्य तब तक पूरा नहीं हो सकता, जब तक हमारे MSMEs सफल न हों।
आज MSMEs के सामने चुनौतियों के साथ-साथ बाजार की मांग भी तेजी से बढ़ रही है। कच्चे माल और मजदूरी की लागत बढ़ी है। ग्राहकों की उम्मीदें बदल रही हैं और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा लगातार कड़ी हो रही है। इसके साथ ही बेहतर गुणवत्ता बनाए रखने और कम समय में डिलीवरी देने का दबाव भी बढ़ा है। इन परिस्थितियों ने मैन्युफैक्चरिंग के पुराने तरीकों पर काफी बोझ डाल दिया है।
बाजार की इस होड़ में टिके रहने और मजबूत बने रहने के लिए MSMEs को अपने कामकाज के तरीकों को आधुनिक बनाना होगा। अब सवाल यह नहीं है कि नई डिजिटल तकनीक अपनाई जाए या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि इसे किफायती और सही तरीके से कैसे लागू किया जाए, ताकि विकास का लाभ व्यापक स्तर पर पहुंचे और आम नागरिक के हितों को ध्यान में रखा जा सके।
महज ऑटोमेशन नहीं, सार्थक बदलाव की जरूरत
ऐसे समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और ऑटोमेशन बड़ा बदलाव लाने का अवसर दे रहे हैं। अगर इनका सही ढंग से और जिम्मेदारी के साथ इस्तेमाल किया जाए तो ये कंपनियों को अधिक स्थिर बनाने के साथ कर्मचारियों की भलाई में भी योगदान दे सकते हैं। इससे उत्पादन और प्रतिस्पर्धा की क्षमता बढ़ने के साथ भविष्य में बेहतर रोजगार के अवसर भी पैदा हो सकते हैं।
देश में AI को लेकर होने वाली चर्चा अक्सर इसकी तकनीकी क्षमताओं तक सीमित रहती है। लेकिन MSMEs के लिए AI का वास्तविक फोकस उन फायदों पर होना चाहिए, जो जमीन पर दिखाई दें और कारोबार को मजबूत बनाने में मदद करें।
कोई भी तकनीक अंततः लोगों की भलाई के लिए होती है। इसलिए AI को अपनाने का नजरिया भी आम नागरिक के हितों को ध्यान में रखकर होना चाहिए। इसका मतलब सुरक्षित कार्यस्थल, अधिक उत्पादकता, रोजगार की सुरक्षा, मजबूत उद्योग और समाज के लिए बेहतर आर्थिक अवसर सुनिश्चित करना है। इसका उद्देश्य इंसानों की जगह लेना या उनकी नौकरियां छीनना नहीं, बल्कि कर्मचारियों को आधुनिक तकनीकी उपकरणों से सक्षम बनाना होना चाहिए, ताकि वे अपना काम अधिक प्रभावी ढंग से कर सकें।
AI का एक बड़ा फायदा कामकाज से जुड़े डेटा से ऐसे निष्कर्ष निकालना है, जिनके आधार पर तुरंत ठोस कदम उठाए जा सकें। मशीनों के काम करने के तरीके, प्रोडक्शन रिकॉर्ड और सप्लाई चेन से जुड़ी जानकारी का विश्लेषण करके AI सिस्टम पैटर्न पहचान सकते हैं। इसके आधार पर भविष्य में आने वाली रुकावटों का पहले से अनुमान लगाया जा सकता है और समय रहते सही फैसले लेने में मदद मिल सकती है।
दूसरी ओर, रोबोटिक वेल्डिंग, भारी सामान उठाने वाली ऑटोमैटिक मशीनें, इंसानों के साथ काम करने वाले कोलैबोरेटिव रोबोट्स और स्मार्ट पैकेजिंग जैसी ऑटोमेशन तकनीकें तेजी से कारखानों में जगह बना रही हैं। ये ऐसी गतिविधियों को संभाल सकती हैं, जिनमें बार-बार एक ही काम करना पड़ता है या बहुत अधिक शारीरिक मेहनत लगती है। इससे कर्मचारियों को क्वालिटी कंट्रोल, मशीनों के रखरखाव की निगरानी और ग्राहकों से जुड़ने जैसे महत्वपूर्ण कार्यों पर अधिक ध्यान देने का अवसर मिलता है।
एजेंटिक AI का उदय
तकनीक की दुनिया में Agentic AI System एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में सामने आया है। ये सिस्टम केवल डेटा या जानकारी उपलब्ध कराने वाले पारंपरिक सॉफ्टवेयर से आगे बढ़कर कंपनी के ऑपरेशन्स पर नजर रख सकते हैं, अलग-अलग विकल्पों की तुलना कर सकते हैं और तय नियमों के दायरे में रोजमर्रा के कुछ फैसलों को स्वचालित रूप से लागू करने में सहायता कर सकते हैं।
उदाहरण के लिए, एक ‘प्रोडक्शन प्लानिंग एजेंट’ ग्राहकों के ऑर्डर, मशीनों की उपलब्धता, कर्मचारियों की शिफ्ट, इन्वेंट्री और समय पर डिलीवरी जैसी जरूरतों के बीच तालमेल बनाने में मदद कर सकता है। प्रोडक्शन में संभावित रुकावट का अनुमान लगाकर वह समय रहते सुधार के विकल्प सुझा सकता है।
इसी तरह ‘प्रोक्योरमेंट एजेंट’ स्टॉक पर नजर रख सकता है, भविष्य में कच्चे माल की जरूरत का अनुमान लगा सकता है और अलग-अलग सप्लायर्स की तुलना कर सकता है। इसके अलावा मैनेजर की मंजूरी के लिए वह खरीद आदेश यानी Purchase Order तैयार करने में भी सहायता कर सकता है।
इन तकनीकों से MSMEs को स्टॉक-आउट की समस्या कम करने, गोदाम में अनावश्यक सामान जमा होने से बचाने और वर्किंग कैपिटल के बेहतर प्रबंधन में मदद मिल सकती है।
इन बदलावों के कारण बिजनेस मालिकों और मैनेजरों का रोजमर्रा के तालमेल और समन्वय से जुड़ा बोझ कम हो सकता है। इससे वे बिजनेस की वृद्धि, इनोवेशन और ग्राहकों के साथ बेहतर संबंध बनाने जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर अधिक ध्यान केंद्रित कर सकते हैं।
प्रोडक्टिविटी से नेशनल कॉम्पिटिटिवनेस तक
AI के फायदे केवल कामकाज को आसान और तेज बनाने तक सीमित नहीं हैं। मशीनों में खराबी आने से पहले उसका अनुमान लगाने वाली प्रेडिक्टिव मेंटेनेंस तकनीक डाउनटाइम को कम करने में मदद कर सकती है। इससे मशीनों का बेहतर इस्तेमाल सुनिश्चित हो सकता है।
इंटेलिजेंट इंस्पेक्शन सिस्टम खराब उत्पाद बनने और कच्चे माल की बर्बादी को कम करने में मदद कर सकते हैं। इससे उत्पाद की गुणवत्ता में सुधार की संभावना बढ़ती है। वहीं AI आधारित इन्वेंट्री मैनेजमेंट से वर्किंग कैपिटल के अधिक प्रभावी इस्तेमाल में मदद मिल सकती है।
रोजमर्रा के कागजी और प्रशासनिक कार्यों के ऑटोमेशन से वित्त और ऑपरेशन्स से जुड़ी टीमें अपना समय रणनीतिक फैसलों में लगा सकती हैं। कुछ केस स्टडीज में प्रेडिक्टिव मेंटेनेंस के माध्यम से औद्योगिक डाउनटाइम में लगभग 30 प्रतिशत तक कमी का उल्लेख किया गया है।
इन सुधारों से भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए मजबूती मिल सकती है। साथ ही देश के भीतर किसी भी तरह के व्यवधान को झेलने में सक्षम मजबूत सप्लाई चेन बनाने में भी मदद मिल सकती है।देश के नजरिए से मजबूत MSMEs का अर्थ अधिक निर्यात, बेहतर औद्योगिक उत्पादन, रोजगार के नए अवसर और लगातार आर्थिक विकास से है।
भारी निवेश के बिना आधुनिकीकरण
AI और इंडस्ट्रियल ऑटोमेशन को लेकर लंबे समय से यह धारणा रही है कि इन्हें अपनाने के लिए बहुत बड़े निवेश की जरूरत होती है। हालांकि क्लाउड कंप्यूटिंग, Software-as-a-Service (SaaS) मॉडल और इंडस्ट्रियल AI प्लेटफॉर्म में हुई प्रगति ने तकनीक अपनाने के कई तरीकों को पहले की तुलना में अधिक सुलभ बनाया है।
आज AI का दायरा काफी व्यापक हो चुका है और कारखानों तथा उद्योगों की जरूरतों के अनुसार कई इंडस्ट्रियल एप्लिकेशन उपलब्ध हैं।
Siemens Industrial Copilot AI आधारित इंडस्ट्रियल असिस्टेंट के रूप में इंजीनियरिंग, मशीन मेंटेनेंस और मैन्युफैक्चरिंग ऑपरेशन्स में सहायता प्रदान करने के लिए बनाया गया है। यह वर्कफ्लो को बेहतर बनाने और तकनीकी समस्याओं के समाधान में मदद कर सकता है।
PTC ThingWorx एक इंडस्ट्रियल IoT और डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जो मशीनों की रियल-टाइम निगरानी, प्रेडिक्टिव मेंटेनेंस और स्मार्ट ऑपरेशन्स में सहायता करता है।
GE Digital Asset Performance Management (APM)** का उपयोग परिसंपत्तियों के प्रदर्शन, विश्वसनीयता और संभावित खराबियों से जुड़े प्रबंधन के लिए किया जाता है। इसका उद्देश्य डाउनटाइम और परिचालन जोखिम को कम करने में मदद करना है।
Sight Machine शॉप-फ्लोर से मिलने वाले डेटा को उपयोगी और एक्शन योग्य जानकारी में बदलने पर केंद्रित है। इससे प्रोडक्ट क्वालिटी, थ्रूपुट और उत्पादन प्रक्रिया को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।
Augury मशीनों की स्थिति और उनके प्रदर्शन से जुड़े संकेतों का AI की मदद से विश्लेषण करता है। इसका उपयोग संभावित मशीन खराबियों का पहले से पता लगाने और प्रेडिक्टिव मेंटेनेंस में सहायता के लिए किया जाता है।
इसके अलावा Detect Technologies और Robro Systems जैसी भारतीय टेक कंपनियां औद्योगिक निरीक्षण, सुरक्षा निगरानी और AI आधारित क्वालिटी कंट्रोल जैसे क्षेत्रों में समाधान विकसित कर रही हैं।
इसलिए अब चर्चा केवल इस बात पर केंद्रित नहीं होनी चाहिए कि तकनीक कितनी महंगी है। इसके बजाय ऐसा इकोसिस्टम तैयार करने पर ध्यान देना चाहिए, जिससे MSMEs इसे तेजी से और व्यावहारिक तरीके से अपना सकें।
तकनीक अपनाने का व्यावहारिक तरीका यह हो सकता है कि शुरुआत ऐसे क्षेत्रों से की जाए, जहां उसका प्रभाव जल्दी और मापने योग्य रूप में दिखाई दे। उदाहरण के लिए प्रेडिक्टिव मेंटेनेंस, AI आधारित विजुअल इंस्पेक्शन और स्मार्ट प्रोडक्शन प्लानिंग जैसे क्षेत्रों से शुरुआत की जा सकती है।एक बार शुरुआती परियोजनाओं से ठोस परिणाम मिलने लगें तो कंपनियां धीरे-धीरे अन्य प्रक्रियाओं और कारखानों में भी इन तकनीकों का विस्तार कर सकती हैं।
सरकार और नीति निर्माताओं की भूमिका
इस बड़े बदलाव को संभव बनाने के लिए सरकार और नीति निर्माताओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। सब्सक्रिप्शन आधारित तकनीकी मॉडल को बढ़ावा दिया जा सकता है, ताकि MSMEs को शुरुआत में बहुत बड़ा पूंजीगत खर्च न करना पड़े।
Industry 4.0 तकनीकों को अपनाने वाले MSMEs के लिए विशेष ग्रांट और पायलट प्रोजेक्ट्स को बढ़ावा देने पर भी विचार किया जा सकता है। इसके साथ ही विश्वविद्यालयों और ITIs में क्षेत्रीय स्तर पर AI और मैन्युफैक्चरिंग इनोवेशन सेंटर स्थापित किए जा सकते हैं, जहां उद्योगों को तकनीक के व्यावहारिक इस्तेमाल का प्रदर्शन दिया जा सके।
इंटरऑपरेबिलिटी स्टैंडर्ड विकसित करना भी महत्वपूर्ण हो सकता है, ताकि नई तकनीक पुरानी मशीनों के साथ आसानी से जुड़ सके और कंपनियां किसी एक वेंडर पर अत्यधिक निर्भर न हों।
डिजिटल रूप से सक्षम कारखानों में हाई-वैल्यू भूमिकाओं के लिए कर्मचारियों को तैयार करने हेतु वर्कफोर्स रीस्किलिंग और अपस्किलिंग कार्यक्रमों को भी बढ़ावा दिया जाना जरूरी है। युवाओं को तकनीकी शिक्षा और आधुनिक मैन्युफैक्चरिंग में करियर के लिए प्रोत्साहित करना भी इस बदलाव का अहम हिस्सा हो सकता है।
ऐसे कदमों से कंपनियों के वित्तीय और परिचालन जोखिम कम करने तथा भारतीय मैन्युफैक्चरिंग नेटवर्क में नई तकनीकों के विस्तार में मदद मिल सकती है।
मानवीय पहलू को संभालना जरूरी
नई तकनीक को अपनाना तभी सफल होगा, जब कर्मचारी भी इस बदलाव का हिस्सा बनें। मशीनों के आने से नौकरियां जाने की आशंका को लेकर कर्मचारियों के साथ खुलकर संवाद और उनके कौशल विकास में निरंतर निवेश जरूरी है।
ऑटोमेशन के साथ काम की प्रकृति बदल सकती है और मशीन सुपरविजन, क्वालिटी मैनेजमेंट, डिजिटल ऑपरेशन्स, ग्राहक प्रबंधन और डेटा आधारित निर्णय जैसी नई भूमिकाओं की जरूरत बढ़ सकती है।
इसलिए कर्मचारियों को नई तकनीक सिखाना और उनके कौशल को निखारना हर AI कार्यक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए। हर स्तर के कर्मचारियों को डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए तैयार करने की दिशा में प्रयास किए जाने चाहिए, ताकि तकनीकी बदलाव का लाभ व्यापक स्तर पर पहुंच सके।
आधुनिकीकरण ऐसा होना चाहिए, जो कंपनियों को मजबूत बनाने के साथ लोगों के लिए नए अवसर भी पैदा करे। आर्थिक विकास और रोजगार के अवसरों को साथ-साथ आगे बढ़ाना इस प्रक्रिया की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।
पॉलिसी मेकर्स और सार्वजनिक संस्थानों की भूमिका
AI को जिम्मेदारी से अपनाने की रफ्तार बढ़ाने के लिए विभिन्न संस्थानों के बीच सहयोग जरूरी है। नीति निर्माता, केंद्र और राज्य सरकार की संस्थाएं, बैंक एवं वित्तीय संस्थान, तकनीक उपलब्ध कराने वाली कंपनियां और शिक्षा जगत मिलकर ऐसा इकोसिस्टम विकसित कर सकते हैं, जो जमीनी जरूरतों और उद्योगों से मिलने वाले फीडबैक पर आधारित हो।
सरकारी नीतियों के माध्यम से CSR फंड की मदद से पायलट प्रोजेक्ट्स को समर्थन, तकनीक प्रदर्शन केंद्रों की स्थापना और उद्योग के लिए साझा मानकों को बढ़ावा देने जैसे कदम उठाए जा सकते हैं।
इन प्रयासों से नई तकनीक को पुरानी मशीनों के साथ जोड़ना आसान हो सकता है और तकनीक अपनाने की लागत को भी कम करने में मदद मिल सकती है।
भविष्य के लिए एक नजरिया
भारत आज एक नए औद्योगिक युग की ओर बढ़ रहा है। AI और ऑटोमेशन अब केवल बड़ी कॉरपोरेशन्स तक सीमित तकनीक नहीं हैं। ये तेजी से ऐसे व्यावहारिक टूल्स बन रहे हैं, जिनका इस्तेमाल MSMEs अपनी उत्पादकता, गुणवत्ता और प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ाने के लिए कर सकते हैं।
आगे का रास्ता पुरानी व्यवस्थाओं को अचानक बदलने के बजाय चरणबद्ध और जिम्मेदार आधुनिकीकरण का हो सकता है। नई तकनीक को कर्मचारियों के विकास, चरणबद्ध निवेश और आम नागरिक के हितों को ध्यान में रखकर मिलने वाले परिणामों से जोड़ना होगा।
इससे MSMEs मजबूत व्यवसाय खड़े करने के साथ उत्पादन बढ़ाने और लोगों के लिए बेहतर रोजगार के अवसर पैदा करने में योगदान दे सकते हैं।
भारतीय मैन्युफैक्चरिंग का भविष्य केवल इस बात से तय नहीं होगा कि कौन कितनी तेजी से ऑटोमेशन अपनाता है। महत्वपूर्ण यह भी होगा कि आधुनिकीकरण किस तरह स्पष्ट लक्ष्यों, समावेशिता, कर्मचारियों के विकास और व्यावहारिक परिणामों के साथ किया जाता है।
अगर इस अवसर का समझदारी और जिम्मेदारी के साथ इस्तेमाल किया जाता है, तो भारतीय MSMEs वैश्विक स्तर पर अपनी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ा सकते हैं, घरेलू बाजार के उतार-चढ़ाव से निपटने की क्षमता मजबूत कर सकते हैं और उन लाखों लोगों के लिए अधिक अवसर पैदा कर सकते हैं, जिनकी आजीविका इन उद्यमों से जुड़ी हुई है।
आलेख: मनोज लाल
